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20 Nov 2025 · 1 min read

तुम जो महंगे ख्वाब देखते हो

तुम जो महंगे ख्वाब देखते हो,
खुद को उभरता आसमान देखते हो।
मगर हकीकत-ए-धरातल की भाषा में
यूँ वक़्त के रिसे दरारों से, क्यूँ अनजान फिरते हो ?

शहर की चकाचौंध में जो भूले भटके हो,
झूठी परछाइयों से आज भी अटके हो।
कहीं थकान-ए-हथेली ने,
ढेरों अरमान बुन बैठे हं
फिर क्यूँ दो पल की चाहत में
यूँ बेबजह तुम लटके हो

तुम जो महंगे खवाब देखते हो,
उम्मीद-ए-जमीं, खोखले वादों से सींचते हो।
तमाम कोशिशायें एक तरफ ,
तुम फिर यूँ राहों में असमंजस ही चुनते हो।

कब लौट रहे उन राहों पे
जहां सपनो को हकीकत-ए-आकार मिलता हो।।
शहरी हरियाली तो क्षणिक ही रहेगी
जहां ताउम्र-ए- जीवन साकार मिलता हो।।

✍️ Palak shreya

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