दोहे
दोहे
सृजन- सुमन खिलते रहें,
हो निष्क्रियता दूर।
महकेगी तब वाटिका,
चले कलम भरपूर।।01।।
पंछी लौटे बाग में,
खुशियाँ हैं चहुँ ओर।
गीत- सुहाने गा रहे,
कोयल, तोता, मोर।।02।।
मूड नहीं जब ठीक हो,
लें काफ़ी या चाय।
तत्व यही है ज्ञान का,
होगी बड़ी सहाय।।03।।
चाय चाय बस चाय ही,
आज यही उन्वान।
गर्म चाय भाती तभी
सीधे कप में छान।।04।।
डॉ . रागिनी ,इंदौर