तन्हाई का आलम
तन्हाई का आलम
तन्हाई का आलम क्या है,
समझिए ज़रा इस तरह—
भीड़ के मेले में घिरकर भी,
मन रहता है तन्हा कुछ इस तरह।
कंधों की तो कमी नहीं यहाँ,
पर दिल को राहत दे
सर रखकर सोने वाला
वो अपना सा साहिल कहाँ?
मुस्कान लिए हम चलते रहे,
ग़म की आहट कोई न जाने;
आँखों में सवाल लिए हम,
दिल में अनकहे फ़साने।
भीड़ में ढूँढते हैं हम,
अपनी सी कोई परछाईं;
पर पास होकर भी सब हमसे,
रह जाती है वही पुरानी तन्हाई।
मुकेश शर्मा