इंसान ही रहने दीजिए
इंसान ही रहने दीजिए
मुझे ताज की ख्वाहिश नहीं,
बस इंसान ही रहने दीजिए।
अरमान भी भारी नहीं मेरे,
संवेदनाओं में ही रहने दीजिए।
आज सिर पर बैठा लोगे शायद,
कल ज़मीन पर गिरा दोगे—
तो वह चोट मैं कैसे सह पाऊँगा?
तुम तो ढूंढ लोगे नई राहें,
मैं अकेला साहिल तक कैसे पहुँच पाऊँगा?
उम्मीद की लौ भी मत जलाइए,
क्योंकि जानता हूँ—
उम्मीद तोड़कर फिर कहाँ लौट आओगे…
अतीत ने सिखाए हैं कुछ पाठ,
उन्हीं में ठोकरें भी थीं कई;
उन गलियों में फिर भटकूँ—
ये मेरी फितरत नहीं।
मुकेश शर्मा