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19 Nov 2025 · 1 min read

हम मन में मन - भर भार लिए चलते हैं,

हम मन में मन – भर भार लिए चलते हैं,
नित चिंतन का व्यापार लिए चलते हैं।
बाहर तो हम झिलमिल झिलमिल हँसते हैं,
किन्तु दुःख का अंबार लिए चलते हैं।

© ऋतुपर्ण

#अंतर्राष्ट्रीय_पुरुष_दिवस

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