पुरुष दिवस 19/11/2025 पर विशेष -ग़ज़ल
मुहब्बतों की भी अब, रस्म, निभाया न करो,
बज़्म में मुझको अब, अपना भी जताया न करो।
अब तो कांटों से, हो गई है जो, यारी अपनी,
खिले थे गुल भी कभी, याद दिलाया न करो।
याद करता हूं, तो आता है कलेजा, मुंह को,
ले के सरगोशियां, ख़्वाबों में यूं आया न करो।
आंधियों की भी, सियासत पे, ग़ौर फ़रमाएं,
लरजती शाख़ हो, तो और झुकाया न करो।
रौशनी से भी मिरा, दम है अब घुटता “आशा”,
पुरुष दिवस है, कह के दिल ये जलाया न करो..!
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