सत्यमेव जयते ?
ऐसा क्यूँ होता है जो दिखता वो सच नही होता है ,
सच को क्यूँ हमेशा झूठ के परदे में छुपाया जाता है ,
क्या हम सच जानने के लिए उत्सुक नही है ?
या अतंरात्मा को दबाकर मानसिक गुलाम बन गए हैं,
जिधर देखो झूठ का बोलबाला है ,
सच बोलने की हिमाकत करनेवाले का मुँह काला है ,
झूठे लोगों की फौज खड़ी है ,
सच्चे लोगों की हस्ती अलग -थलग पड़ गई है ,
क्या यही हमारी नियति है जो हमें भोगनी पड़ रही है ,
छद्म का आवरण ओढ़े हम कब तक सब सहते रहेंगे ,
हमारी त्रासदी के ये दिन क्या कभी फिरेंगे ?
या अच्छे दिन की प्रतीक्षा में थककर
हम प्रस्थान करेंगे।