रामपुर के रत्न भाग 2 (समीक्षक: नितिन कुमार जैन)
रामपुर के रत्न भाग 2: समीक्षक नितिन कुमार जैन
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रामपुर की रत्न के विमोचन पर नवीन भाई आपके द्वारा लिखा गया विस्तृत दृष्टिकोण निश्चय ही प्रभावशाली है
वास्तव में जब कोई अपने शहर की स्मृतियों को इतनी कोमलता से सहेजता है कि पाठक को लगने लगे जैसे कोई पुराना संदूक खुला हो और उसमें से बचपन की खुशबू निकल रही हो, तो समझिए कि कोई रवि प्रकाश उदित हुआ है।
श्री भारत भूषण जैन जी के घर पर “रामपुर के रत्न” भाग के पृष्ठ पलटते हुए मुझे कई बार लगा कि यह किताब नहीं, एक लम्बी साँस है जो रामपुर ने तीन दशक बाद फिर पूरी छाती से ली है। शहर ने जैसे खुद अपने भीतर दबी हुई आवाज़ों को बुलाया हो और कहा हो – “अब बोलो, दुनिया सुन ले।”
यहाँ नाम बहुत हैं, पर नामों से परे एक गहरा मौन है। वह मौन जो उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ की आखिरी साँस में था, वह मौन जो शम्भूनाथ ‘साइकिल वाले’ की घंटी में बजता रहा, वह मौन जो डॉ. सुचेता गोइंदी की कलम की स्याही में सूख गया था – रवि प्रकाश जी ने उसे फिर से तर कर दिया है।
मेरे दादाजी श्री कल्याण कुमार जैन शशि का भी उल्लेख रामपुर के रतन भाग 1 के संदर्भ में कई स्थानों पर स्मरण किया गया है जिसके लिए भी धन्यवाद !!
सबसे खूबसूरत हिस्सा यह कि लेखक ने कहीं भी “मैंने यह किया” का ढोल नहीं पीटा। बल्कि हर पृष्ठ पर वह खुद पीछे हट जाते है ताकि पाठक और उन रत्नों के बीच कोई दीवार न रहे। यह विनम्रता ही खुद उन्हें सबसे बड़ा रत्न बना देती है।
किताब पढ़ते हुए पेज दर पेज नया चेहरा हमारे साथ आकर बैठ जाता। कभी आचार्य बृहस्पति मेरे सामने तबला बजा रहे होते, कभी मौलाना यूसुफ इस्लाही चुपचाप नमाज़ पढ़ते दिखते, कभी रवि देव रामायणी की आवाज़ दीवारों से टकराती। लगा – मेरे साथ जैसे रामपुर मेरे साथ चहलकदमी में था।
विमोचन की तस्वीरें भी फेसबुक पर देखीं। उनमें कुछ बुजुर्गों की आँखें ऐसी थीं मानो वे दशकों बाद अपने बाप-दादा को जीवित देख रहे हों। एक बेटी ने किताब को सीने से लगाया और कुछ देर तक कुछ बोल ही नहीं पाई। उस पल समझ में आया कि साहित्य का सबसे ऊँचा पुरस्कार यही है – किसी की खामोशी को आवाज़ दे देना।
रामपुर छोटा शहर है, यह बात सही है।
पर रवि प्रकाश जी ने सिद्ध कर दिया कि छोटे शहरों के भीतर भी अनन्त ब्रह्माण्ड होते हैं – बस कोई उन्हें देखने की नजर चाहिए। उन्होंने वह नजर दी है। अब हमारी बारी है कि हम उस नजर को आँखों में भर लें और अपने शहरों के भीतर छिपे रत्नों को पहचानें।
यह किताब कोई संग्रह मात्र नहीं, एक खुला निमंत्रण है।
निमंत्रण इस बात का कि हम भी अपने आसपास के गुमनाम नायकों को देखें, उनकी कहानियाँ सुनें, उन्हें लिखें, उन्हें जीवित रखें। क्योंकि जब तक याद रहेंगे ये लोग, तब तक हमारा शहर मरेगा नहीं।
रवि प्रकाश जी,
आपने जो किया वह कोई किताब लिखना नहीं, एक शहर को उसकी आत्मा लौटाना है।
इसके लिए जितना भी कहा जाए, कम है।
बस इतना कहूँगा – आपकी कलम में, आपकी कृतित्व में, आपके खामोश जुनून में जो जादू है, वह कभी कम न हो।
और रामपुर की ये स्मृतियाँ, आपकी स्याही में हमेशा साँस लेती रहें।
हृदय से धन्यवाद। 🙏