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19 Nov 2025 · 3 min read

“तस्वीर खिंचबाने की आफ़त” मिथिला -दर्शन (संस्मरण)

दिनांक : 19 11 2025
विषय : यह संस्मरण 70 के दशक में मिथिला सामाजिक परिवेशों का आंकलन करता है !
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“तस्वीर खिंचबाने की आफ़त”
मिथिला -दर्शन
(संस्मरण)
डॉ लक्ष्मण झा परिमल
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28 जून 1974 को मेरी शादी हुई और ठीक चार दिनों के बाद मेरी छुट्टी खत्म हुई ! मुझे लखनऊ मिलिटरी प्रशिक्षण के लिए लौटना पड़ा ! सबको पता था कि मैं शादी करके लौटा हूँ !
सब पूछने लगे ,–“ बताओ ,भाभी जी कैसी हैं ?
मैंने जवाब दिया ,—” सुंदर अति सुंदर !”
“अरे ! कुछ और बताओ” सब लोग मेरे इर्द -गिर्द आ गए ! उनलोगों में उत्सुकता बढ़ने लगी!
“शादी मेरी सौरठ सभा गाछी से हुई ! मिथिला पद्धति के अनुकूल पंजियार ने शादी का सिद्धांत बनाया ! गौत्र,मूल और कई पीढ़िओं तक जांच परख हुई फिर शादी की बारात निकल कर पैदल 9 बारातिओं के साथ मधुबनी के शिवीपट्टी में पहुँचकर आशा से शादी हुई ! मैंने नहीं अपनी आशा को, कभी देखा था और ना वो मुझे जानती थी !”
अशोक गर्ग ने बीच में ही मुझसे पूछा ,– “झा साहब ! आप कितने दिनों तक भाभी के साथ रहे?”
मैं झल्ला उठा और अपनी दुख भारी दास्ताँ सबको बताया ,—
”बहुत रो पीटकर 18 दिनों की आकस्मिक छुट्टी ही मिली थी ! लखनऊ से दुमका जाना , फिर वहाँ से मधुबनी जाना और दो दिनों तक सभा गाछी का चक्कर लगाने में आधी छुट्टी ही मेरी खत्म हो गयी थी ! शादी के बाद ससुराल में कम से कम चतुर्थी तक तो रुकना ही पड़ता है ! तीन दिन तक तुम्हारी भाभी से ना बातें हुई और ना उनका मुँह ही देख पाया ! बस चौथे दिन फिर से शादी हुई और दूसरे दिन ही मेरी छुट्टी खत्म और मैं लखनऊ आ गया !”
चम्पा लाल ने दुख प्रकट करते हुये कहा ,–” चलो छोड़ो, एक तस्वीर ही उनकी दिखा दो!”
“तस्वीर मैं कहाँ से लाऊँ ? यह तो फोटो स्टुडियो से ही संभव हो सकता था पर जब मैं ही अपनी आँखों में उनकी तस्वीर को ना रख सका तो भला तुमलोगों को कैसे दिखाऊँ ? अगली बार जाऊंगा तो कोशिश करूंगा तस्वीर खिंचबाने की !”
पाँच महीने के बाद मुझे ट्रेनिंग सेंटर से अक्तूबर 1974 में दस दिनों की आकस्मिक छुट्टी मिली ! पहले अपने घर आया फिर एक दिन के बाद माता -पिता जी ने कहा ,–
“इतने दिनों के बाद आये हो , जाओ ससुराल भी होकर आ जाओ!”
दुमका से मधुबनी 12 घंटे लग ही जाते थे ! बस से जसीडीह ,जसीडीह से ट्रेन समस्तीपुर तक ,समस्तीपुर से दरभंगा और दरभंगा से मधुबनी ! मधुबनी से रिक्शा पकड़के 8 किलोमीटर शिवीपट्टी गाँव पहुँचना पड़ता था ! काफी दिक्कत से वहाँ पहुँचा ! स्वागत हुआ ! गाँव के सारे लोग मुझे देखने के लिए पहुँच गए ! यथोचित सबको अभिवादन किया ! सब लोग खुश थे !
एक दो दिन के बाद अपनी सास को मैंने दबी जुबान अपनी इच्छा व्यक्त की,—
“हमलोग अपनी तस्वीर खिंचबाना चाहते हैं ! इसके लिए शहर मधुबनी जाना होगा!”
मेरी सास सदा घूँघट में ही रहती थी! उन्होंने भी दबी जुबान से मुझे बताया,–
” यह तो बहुत मुश्किल है ! गाँव के लोग को पता चल जाएगा ! आपकी नयी -नयी शादी हुयी है ! मैथिल समाज में यह उपहास का विषय है ! और आपके ससुर को यदि पता लग गया तो पता नहीं क्या होगा ?”
मुझे तो फोटो खिंचबाने थे ! सब लोग दुमका और लखनऊ में मेरी पत्नी की तस्वीर देखना चाहते थे ! मैं मायूस हो गया था ! किसी तरह अपनी पत्नी को मना पाया था !
दूसरे दिन सास मेरे करीब आई और चुपके से मुझे कहा,–
“कल बाबू जी कहचरी जाएंगे ! जमीन का मुकदमा है ! दिनभर आपलोग भी परदेवाली रिक्शा पर बैठ कर मधुबनी चले जाइए और जल्द लौट आइये !”
बस हमलोगों की लौटरी खुल गयी ! दूसरे दिन चोरी- चोरी, चुपके- चुपके मधुबनी शंकर चौक पहुँच गए ! ठीक शंकर चौक पर अनुपम स्टुडियो में आशा और मैंने फोटो खिंचबाया ! बॉबी फिल्म शंकर टाकीज़ में हम लोगों ने देखी, वहीं जलपान किया और शिवीपट्टी लौटकर आ गया ! इस तरह “तस्वीर खिंचबाने की आफ़त” से बाल -बाल बचे ! तस्वीर लाकर सबों को दिखाया !
सब खुश थे और मैं भी खुश !
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@डॉ लक्ष्मण झा परिमल

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