इख्तिलाफ़
इख़्तिलाफ़ कितने है हमारे दरम्यान।
छोड़ना इक दूजे को नहीं है आसान।
बहुत बार जिल्लत सही गालियों की
सोचती हूं क्या मैं नहीं हूं कोई इंसान।
घर और रिश्ता मैंने तोड़ना नहीं चाहा
गला घोंट कर दफनाए लाखों अरमान।
औरत ही झुके ,ये कहां लिखा हुआ है
नये नये क्यूं जारी करते हो फरमान।
जिंदगी आसान जंग नहीं मैंने माना
याद रखना तुम भी नहीं हो भगवान।
सुरिंदर कौर