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20 Nov 2025 · 1 min read

दोहा पंचक. . . . जिंदगी

दोहा पंचक. . . . जिंदगी

चलती है यह जिंदगी, मनमर्जी की चाल ।
अपने पीछे छोड़ती, उलझे हुए सवाल ।।

हरदम भरती जिंदगी, सपनों भरी उड़ान ।
पंखों में यह चाहती, सीमा हीन वितान ।।

उलझे-उलझे जिंदगी, करती बड़े सवाल ।
अक्सर लुढ़के उस तरफ, मिले जहाँ पर ढाल ।।

तनहाई में जिंदगी, खूब निभाती साथ ।
कभी हकीकत सी लगे, और थाम ले हाथ ।

चार दिनों की जिंदगी, यारो बड़ी कमाल ।
कठिन समझना है इसे, इसका अर्थ विशाल ।।

सुशील सरना / 20-11-25

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