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18 Nov 2025 · 1 min read

उजाड़ घरों को परिंदे शहर उड़ गए

रोकते ही रह गये बाग मगर उड़ गए
उजाड़ घरों को परिंदे शहर उड़ गए

उसकी बातें इतनी जो हल्की लगी
छोड़ भारीपन अब पत्थर उड़ गए

जिंदगी में अपनी ख्वाहिश हज़ार
नींद आंखों से आठों पहर उड़ गए

गलत रास्ते कब रहे है आसान
एक क्या दस – दस सर उड़ गये।

बात हमने कहा था कुछ और ही
लोगों में बात तो दिगर उड़ गए ।

बदल- बदल के ना यूं तेल लगाओ
क्या होगा बाल सर के अगर उड़ गए ।

नूर फातिमा खातून नूरी
जिला -कुशीनगर

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