उजाड़ घरों को परिंदे शहर उड़ गए
रोकते ही रह गये बाग मगर उड़ गए
उजाड़ घरों को परिंदे शहर उड़ गए
उसकी बातें इतनी जो हल्की लगी
छोड़ भारीपन अब पत्थर उड़ गए
जिंदगी में अपनी ख्वाहिश हज़ार
नींद आंखों से आठों पहर उड़ गए
गलत रास्ते कब रहे है आसान
एक क्या दस – दस सर उड़ गये।
बात हमने कहा था कुछ और ही
लोगों में बात तो दिगर उड़ गए ।
बदल- बदल के ना यूं तेल लगाओ
क्या होगा बाल सर के अगर उड़ गए ।
नूर फातिमा खातून नूरी
जिला -कुशीनगर