काव्यात्मक- ब्रजयात्रा व्रतांत (दोहा शैली)
मित्र मंडली को जगी, वृंदावन की प्रीत।
अजित सचिन के साथ में, दुष्यंत रवि विनीत।।
भक्ति रस में डूब कर, खूब किया आनन्द।
देखे केलि कुँज में, बाबा प्रेमानन्द।।
राधा-मोहन के निकट, देख कालिया घाट।
कुंज गलिन में देखिए, ठाकुर जी के ठाठ।।
निकुंज वट की छाँव में, बैठे भोलेनाथ।
वहीं रुद्र अष्टक किया, हम पाँचों ने साथ।।
बांके बिहारी लाल के, दर्शन मिले अनूप।
श्याम सलोने गात में, अद्भुत सुंदर रूप।।
राधा बल्लभ लाल की, लीला बड़ी विचित्र।
जैसी नजरें भक्त की, वैसा दिखता चित्र।।
राधारमण जी हमसे, मिले सदा नाराज।
पल भर की देरी हुई, फिर से चूके आज।।
निधिवन में निधियाँ झुका, वृंदा करतीं रास।
पग-पग राधा-कृष्ण का, होता है आभास।।
धूप दीप नैवेद्य ले, अंतस किया अमान।
फिर नौका में बैठकर, किया दीप का दान।।
यमुना जी में तैरतीं, तल-तर तरणीं तीर।
कल-कल करतीं आचमन, खारा-खारा नीर।।
महारास से हो गईं, राधा अंतर्ध्यान।
इमली तले ही बैठकर, किया कृष्ण ने ध्यान।।
इस इमली के पेड़ से, लोग हुए अनजान।
महाप्रभु चैतन्य ने, फिर से दी पहचान।।
देख देवरहा संत का, यमुना तीर मचान।
चंचल मनवा कह उठा, फीके महल मकान।।
ऊँचे इसी मचान को, करके राधे-श्याम।
फिर से आगे बढ़ गए, हम पाँचों अविराम।।
अकबर दर्शन के लिए, पहुँचा जिनके धाम।
ऐसे वाद्य प्रवीन थे, हरिदासी उपनाम।।
जहाँ नही है आज भी, कल-युग का सम्मान।
वृंदावन के बीच में, है इक टटिया स्थान।।
यहाँ बैठकर देखिए, उदय मध्य अवसान।
कितना कल-युग मुक्त है, यह टटिया स्थान।।
भूख लगी थी जोर से, लंगर छका अमान।
दान दक्षिणा भेंट कर, किया शेष प्रस्थान।।
लगा ब्रजरज भाल पर, चखा भक्ति का चूर्ण।
निकट गौरी-गोपाल के, परिक्रमा की पूर्ण।।
अगणित गौ के आश्रम, अगणित सेवा धाम।
अगणित सेवा संत की, अगणित ही घनश्याम।
सकल वर्णनातीत है, श्री वृंदावन धाम।
गोपी-गोपी राधिका, बच्चा-बच्चा श्याम।।
©दुष्यंत ‘बाबा’