दोहा सप्तक. . . विविध
दोहा सप्तक. . . विविध
जीवन के हर मोड़ पर, सिर्फ भीड़ ही भीड़ ।
मिटें जहाँ बैचेनियाँ, मिला नहीं वह नीड़ ।।
बैचैनी है हर तरफ, जाने क्या है बात ।
क्या जीवन में चैन का, होगा कभो प्रभात ।।
माना होता धन बिना , कभी न कोई काम ।
निर्विवाद यह सत्य पर, यह छीने आराम ।।
धन लोलुप संसार में, समझे जीवन अर्थ ।
प्रेम सत्य संसार का, बाकी सब है व्यर्थ ।।
आपस में किस बात की, मन में रखते डाह ।
क्यों रिश्तों में जीत की, हरदम रहती चाह ।।
आपस की नाराजगी , मन करती बैचैन ।
आँसू से बोझिल सदा, रहते ये दो नैन ।।
अर्थ अश्व पर बैठ कर , करता बड़ा गुरूर ।
दया धर्म को भूलता, मद में रहता चूर ।।
सुशील सरना / 18-11-25