आंखों की यात्रा
//ऐसा हो सकता है कि इन पंक्तियों को पढ़कर आपको ऐसा लगे कि मैं बहुत ही दुर्बल और वासनाओं से ग्रस्त व्यक्ति हूँ।किंतु पूरी ईमानदारी से मैंने जो अनुभव किया वही लिखा है।//
मैंने चाहा
और इसके लिए प्रयत्न भी किये,
पर आँखें जाने क्यों
स्त्री-देह के आसपास ही ठहरती रहीं।
ज्ञान बार-बार कहता रहा
कि देह के पार ही
वास्तविक सुंदरता रहती है,
फिर भी मेरी दृष्टि
घूम-फिरकर वही पाती रही
जो चमकती है, दमकती है,
जो मुस्कुराती है, अदाएँ दिखाती,
इतराती, चलते समय
अपने ही प्रकाश में नहाई प्रतीत होती है।
मैं देख रहा हूँ
भीतर उठते विचारों का वेग,
कामनाओं की अचानक भड़कती लपटें,
उनका मन पर पड़ता दबाव,
और अपनी ही चेतना में
एक अप्रिय-सी बेचैनी।
सोचता हूँ
क्यों नहीं मुक्त हो पाता मैं
इन भौतिक लालसाओं से,
जबकि ज्ञान साफ लिखता है
कि देह क्षणिक है,
और स्थायी कुछ भी नहीं?
क्या यह मेरी दुर्बलता है?
या यह प्रकृति की कोई गहरी छाप,
कोई पुराना जैविक प्रोग्राम
जो मेरी इच्छा से पहले सक्रिय हो जाता है?
क्योंकि सच तो यह है
मनुष्य लाखों वर्षों के
अनुभवों से बना एक पशु भी है,
और उसी पशु-मन की परछाईं
मेरी आँखों में भी चमक उठती है
जब मैं किसी सुंदर, सजीली,
मुस्कुराती स्त्री को देखता हूँ।
क्यों ऐसा है कि
मेरे भीतर वह आकर्षण
उन देहों पर नहीं ठहरता
जो श्रम से काली पड़ी हैं,
जीवन की दागदार धूप में तपती रही हैं,
और जिनकी निर्धनता ने
सुंदरता को रूप नहीं
संघर्ष का आकार दिया है?
क्यों वह आकर्षण
अधिकतर
उन देहों पर ही टिक जाता है
जिन्हें समाज ने “सुंदर” कहा,
जिन्हें परदे पर चमकाया,
और विज्ञापनों में आदर्श बनाया?
मुझे लगता है
यह दोनों हैं।
जैविक भी,
सामाजिक भी।
एक देह में चमक को देखकर
मस्तिष्क कहता है—“यह स्वस्थ है।”
एक मुस्कान देखकर
मन कहता है—“यह ऊर्जा रखती है।”
त्वचा की कोमलता,
कमर का संतुलन,
चेहरे की समरूपता
सब कुछ संकेत बन जाता है
जिसे मैं ‘सुंदरता’ मान लेता हूँ
बिना सोचे, बिना समझे।
और फिर समाज
जिसने मेरी आँखों में
गोरेपन के पोस्टर चिपकाए,
विज्ञापनों में चमकदार देहें रखीं,
फ़िल्मों में आकर्षण को
स्त्री के आँचल में छुपाया,
ऐसे आदर्श बना दिये
जिनके सामने मेरा मन
कभी सहज, कभी असहज,
कभी अपराध-बोध से भरा हुआ
खड़ा रह जाता है।
मैं जानता हूँ
कि सौंदर्य केवल देह नहीं है।
मैं जानता हूँ
कि हर स्त्री एक दुनिया है,
उसके आँसू, उसका श्रम,
उसकी थकान, उसकी इच्छाएँ भी
उस सौंदर्य का हिस्सा हैं
जिसे मेरा मन अक्सर नहीं देख पाता।
लेकिन ज्ञान का जानना
और मन का मानना
दोनों कभी-कभी
एक-दूसरे के विरुद्ध चल पड़ते हैं।
तो क्या करूँ?
कैसे मुक्त होऊँ
उस लहर से जो
बिना पूछे उठती है,
बिना शर्माए माँगती है,
और बिना दया
मन की शांति को चुरा ले जाती है?
शायद मुक्ति का अर्थ
कामना का न होना नहीं है।
कामना मिट नहीं सकती
वह तो जीवन की पहली धड़कन है।
मुक्ति का अर्थ इतना-सा है
कि कामना मुझे चलाए नहीं,
मैं उसे देख सकूँ
जैसे कोई राहगीर
दूसरे राहगीर को देखते हुए
बस एक क्षण मुस्कुराता है
और आगे बढ़ जाता है।
शायद यही सीखना है
कि देह को देह की तरह देखना,
और मनुष्य को मनुष्य की तरह।
सुंदरता को त्वचा में नहीं,
उसके भीतर के
प्रकाश, संघर्ष, सरलता,
और उसके अपने होने में खोजना।
और शायद यही
धीरे-धीरे मुक्त करता है
क्योंकि देह की कामना
अपराध नहीं,
केवल एक स्वाभाविक लहर है;
अपराध तभी होता है
जब दृष्टि उसे
वस्तु में बदल दे।
मैं यह सब देख रहा हूँ,
जान रहा हूँ,
और हर दिन
थोड़ा-थोड़ा
अपने ही मन की
धुंध साफ कर रहा हूँ
कि शायद किसी दिन
मैं देह के पार
उस सुंदरता को देख सकूँ
जो देह से बड़ी है,
और शायद
देह से अधिक सच्ची भी।
तो हे स्त्रियों,
अभी निश्चित ही
मेरी दृष्टि
आपकी देह पर टिक जाती है,
जैसे कोई अनगढ़ मन
पहले बाहरी चमक ही देखता है;
पर मैं निरंतर अभ्यासरत हूँ
देह के पार उस वास्तविक सुंदरता को देखने के लिए
जो आपके भीतर धड़कती है।
मैं प्रयत्न कर रहा हूँ
कि एक दिन
देह को देह,
और मन को मन
अलग-अलग देख सकूँ;
और मुझे विश्वास है
कि मैं सफल होऊँगा
क्योंकि यही वह दृष्टि है
जो मनुष्य को
सिर्फ देखने वाला नहीं,
देख पाने वाला बनाती है।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’