ग़ज़ल
ग़ज़ल
पड़ रहे हैं लफ्ज़ कम के तू बेमिसाल है,
मां मेरी अब भी ज़माने में तू कमाल है।
तू वो आसरा है जिसके दम पर हूं खड़ी,
तेरी ही इन बाहों में पलकर हुई हूं मैं बड़ी।
क्या हूं मैं बिन तेरे कुछ भी नहीं ज़माने में,
मैं तेरा ही अक्स हूं और तू है मेरी जिंदगी ।
कुछ नहीं तेरे सिवा इस जहां में मेरी मां,
हैं तू-ही मेरा जहां और तू-ही मेरा आसरा ।
हर खुशी मेरी तेरी और सारे ग़म तेरे हैं मां,
तेरे आंचल के तले पाया है मैंने यह जहां।
बड़े कितने भी हो लेकिन तेरे लिए बच्चे हैं हम,
ज़माने के लिए कुछ भी सही तेरे लिए सच्चे हैं हम।
तूने सहे सारे सितम अब ग़म से हम आजाद हैं,
तेरी उंगली थामकर देखी ज़माने कि हर बहार है।
मां की ममता अब किसी जन्नत से कम नहीं ,
मां मेरी सलामत ज़माने में मुझे कोई ग़म नहीं।
क्या लिखूं तेरे लिए तू ज़माने में बेमिसाल है,
मां मेरी जन्नत है और छाया मां की कमाल है ।।
फायज़ा फातिमा