क्या लिखूं
सोचता हूँ क्या लिखूं
ना झरनो में वादे हैं, ना नदियों में कोई धारा
सोचता हूँ क्या लिखूं
ना साहिल पे कश्ती है, ना समंदर मे किनारा ।
सोचता हूँ क्या लिखूं
ना शहर में बस्ती है, ना कोई मुसाफ़िरख़ाना
सोचता हूँ क्या लिखूं
ना ख्वाब है आंखों में, ना जग में कोई ठिकाना ।
सोचता हूँ क्या लिखूं
ना दरख़्त के साये है, ना पेड़ आसियाना
सोचता हूँ क्या लिखूं
ना राही को मिली डगर, ना कुदरती ख़ज़ाना ।
सोचता हूँ क्या लिखूं
ना हमे मिला ख़ुदा, ना देखा कोई जमाना
सोचता हूँ क्या लिखूं
ना चाह है मंजिल की, ना जहाँ कोई बसाना ।
……….. By Musarrat Ali
Mirzapur