विषय : इस बदलावी दौर में
विषय : इस बदलावी दौर में
(विधा : छंद चंडिका)
इस बदलावी दौर में , सबके बदले ढंग हैं।
संभव है कहना नहीं, किसके कितने रंग हैं।।
मतलब दिखता स्वार्थ का, कहने को बस अंग हैं।
कल तक जो अपने रहे, आज नहीं वो संग हैं।।
इस बदलावी दौर में , देख-देख हम दंग हैं।
पाला जिस माँ बाप ने , उससे हीं अब तंग हैं।।
दूभर होती जिंदगी , कदम कदम पर जंग है।
आदम की हीं जात से , आज आदमी चंग है।।
__ अशोक झा ‘दुलार’