अगर तुम गाँव जाना
चौबारे में जब
चाँद ठहरा हो कहीं,
उससे ज़रा
नैन मटक्का कर आना—
अगर तुम गाँव जाना।
तितलियों संग
धीमे-धीमे इतराना,
फूलों से
रह-रहकर बतियाना।
अमराइयों से
रसीले आम का
एक कतरा रस
चुरा लाना—
अगर तुम गाँव जाना।
कोयल की मीठी
कुहुक ज़रूर सीखना,
पनघट वाली
साँझ से भी
दो पल मिल आना,
अगर तुम गाँव जाना।
होठों पर
भीनी-सी मुस्कान,
बातों में
अपनी महक का
एक नम-सा ताबीज़
प्रियवर के नाम
ज़रूर छोड़ आना—
अगर तुम गाँव जाना।
और सुन सखी…
हँसी-ठिठोली की
पूरी गठरी
अपने संग ले जाना।
सावन की पहली
बारिश में
मन भरके भीगना,
सहेलियों संग
झूला झूल
थोड़ा-सा गुनगुनाना—
अगर तुम गाँव जाना।
✍️ दुष्यंत कुमार पटेल