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17 Nov 2025 · 1 min read

गुज़र मुश्किल थी दो जिस्मों की दिल के आशियाने में

गुज़र मुश्किल थी दो जिस्मों की दिल के आशियाने में
वगर्ना हर्ज़ ही क्या था तुझे अपना बनाने में

हक़ीक़त में बदलना ख़्वाब को मैं सीख ना पाया
महारत थी मुझे हासिल फ़क़त सपना दिखाने में

हज़ारों बार हर ज़ेर-ओ-ज़बर पढ़कर के ये जाना
हमारा ज़िक्र भी ना था कहीं उसके फ़साने में

रखा नेज़े पे मेरा सर घुमाया उसको गलियों में
नुमाइश हो रही है इश्क की सारे ज़माने में

कुम्हारों से ही पूछे है उन्हीं की चाक की माटी
खपाई क्यों है तुमने उम्र इक गगरी बनाने में

हमारे राज़ पढ़ लेगी नदी ताने भी मारेगी
बहुत मशगूल हो जिसमें हमारे ख़त बहाने में

हवा ने रास्ता बदला समझ पाता शजर कैसे
भरम उसको है लगता वक्त रूठे को मनाने में

तमाशा है भला ये क्या समझ में कुछ नहीं आता
लगाई आग जिसने थी लगा है वो बुझाने में

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