#मुक्तक...
#मुक्तक…
काहे की मायूसी..?
(प्रणय प्रभात)
“वो वक़्त से कब घबराता है, जो वक़्त का पाला होता है।
दिन भूख से लोहा लेता है, तब शाम निवाला होता है।।
मायूस भला क्यूं हो जाऊं, ख़ुद देख रहा हूं बरसों से।
हर रोज़ अंधेरा मरता है, हर रोज़ उजाला होता है।।”
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संपादक
न्यूज़&व्यूज
श्योपुर (मप्र)