देखा खेल तमाशा कुर्सी का !
मैं बैठी थी इस पार,
तू बैठा था उस पार।
हम दोनों के बीच में थी
ज्ञान की मझधार।
तू तैरना न जानता था,
फिर भी स्वांग भरता था।
अपनी अटपटी बातों से
सबको उलझाए रखता था।
तेरे एक इशारे पर थे सब
कठपुतली की तरह नाचते।
बिना अवरोध किए ही
तेरी हर बात थे मानते।
खेल कुर्सी का ही है—
यह तूने भी समझाया था।
जो बैठा उस कुर्सी पर,
विद्वान समझा जाता था।
तेरे लड़खड़ाते शब्दों में भी
वाह-वाह की ताली थी,
और मेरे हर तर्क पर उठती
सबकी झल्लाहट भरी उंगली थी।
सबको रहती थी आस
कि तू ही देगा हर जवाब।
कोई तर्क न कर पाता था—
सबका तू ही तो मसीहा था।
सब तेरी आड़ में जैसे
लग रहे छुपे चालबाज थे।
घर का चूल्हा जलता रहे,
इसीलिए बने हुए ढोंगी थे।
पढ़ने और पढ़ाने की
ललक न किसी को थी।
भूख ज्ञान की उनमें से
न किसी को ही लगती थी।
उनकी चटोरी बनी जिह्वा को बस
स्वादिष्ट भोजन की तलाश थी।
नई – नई योजनाएं भी हर पल
उसी के अनुरूप बनती थी ।
देखा मैंने सब कुछ
और जान लिया तुझे भी।
खेल है यह कुर्सी का,
दोष नहीं है तेरा भी।
जानती हूँ तू भी तो
अपने पेट के लिए मरता है,
चल सके घर की रोजी – रोटी,
इसीलिए तू सबको छलता है।
किंतु गुज़ारिश है तुझसे एक—
संभला जा ! नहीं तो, देख,
ज्यादा नहीं चल पाएगा
यह तेरा रचा हुआ खेल।
शोध कर, गहन अध्ययन कर,
खुद के ज्ञान को समृद्ध कर,
नित कर तू प्रयास ऐसा कि
टोक न सके तुझे कोई मुझ जैसा !
जिससे जीवन न बर्बाद हो
किसी मासूम का।
आखिर हक उसका भी है
सही शिक्षा का !
बस सवाल एक मैं
खुद से ही पूछती थी—
क्या यही शिक्षा की
सही रणनीति थी?
सच्ची शिक्षा पर तो
हर बच्चे का अधिकार है।
किंतु उनका क्या होगा
जब गुरु ही शेर की खाल में
छिपा एक सियार है?