मेरा सुकून
दर्द चेहरे का दिखने में आ ही जाता है
दर्द दिल का लिखने में आ ही जाता है।
और जो दर्द सीने में दफन हुआ हो तो
कभी सिसकियों में बाहर आ ही जाता है।
ये सारे ही दर्द तुम लिख भी दोगे अगर
चौराहे पे कही तुम रो भी दोगे दिनभर।
ये दर्द की दास्तां सुन भी ले सारा नगर
वो कसक कभी ना जगा पाओगे मगर।
जो कसक उठती है दिल में रह-रह कर
आहें निकलती हैं ऑसू संग बह-बह कर।
पर ये दम है कि फिर भी तो ना निकले
बस निकले अरमां तेरा नाम कह-कह कर।
अब तो ये गम गुम करने पर है आमदा
क्या खबर लूं इसकी मैं खुद हूँ गुमशुदा।
सारी दुनिया भूल- भूलाकर हम रह लेंगे
पर ये जान जान से कैसे रहेगी यूं जुदा।
छोटी सी जिंदगी की है एक बड़ी कहानी
लिखने की हम कर चुके थे बड़ी नादानी।
अब जब किरदार ही किनारा करने लगे
तो कैसे कह दूं कि कलम हो गई बेगानी।
ख्वाब खोजें थें खिलाएं थें ये दिल में कई
थी तमन्ना संजोई कुछ पुरानी तो कुछ नई।
पर दिल में सितमों की सुनामी ऐसी टूटी
कि ये टूटे दिले-दास्तान जुबां पे ही रह गई।
न कोई तमाशा-ए-मोहब्बत न ही नुमाइश है
ये बस एक इबादत एक इश्क-ए-कशिश है।
मुझे न सही पर मेरे इश्क को सुकून मिले
अब बस यही आरजू यही एक ख्वाइश है।
~०~
नवंबर, २०२५. ©जीवनसवारो.