#सामयिक-
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■ शब्द प्रयोग और बेपरवाह ई-मीडिया
◆ अब तय हों भूमिका की हदें
【प्रणय प्रभात】
ट्रक भीड़ में घुस गई। कार पुल पर पलट गया। क़ानून अपना काम कर रही है। जनसभा चल रहा है। विज्ञापन दी जा रही है। इंजेक्शन टूट गई। छुरी पेट में घुस गया। ऑटो की पेट्रोल खत्म हो गई। चांदी उछाल मार गया और सोना लुढ़क गई। अपनी आबरू लुटा चुके इस तरह के सैकड़ों वाक्य हर दिन टीव्ही के जरिए आपके घरों व कानों तक भी पहुंच रहे होंगे। यह अलग बात है कि तमामों को इनमें कुछ ग़लत न लगता हो। कुछ इस पर ध्यान देकर भी अपनी मस्ती में मस्त रहते हों अथवा इसे बदलाव मान कर हज़म कर जाते हों। जिन्हें हिंदी भाषा की प्राथमिक स्तर की भी समझ है, वे इसे भाषा के साथ गंदे बर्ताव से अधिक कुछ नहीं मान सकते। भयवश या किसी और कारण से विरोध कर पाएं, न कर पाएं यह एक अलग बात है।
लगभग यही दशा एक विशेष शब्द “स्पष्ट” की है, जिसे छुटभैयों से लेकर उनके बड़े बड़े आका, नेताओं से लेकर राजनेता और प्रवक्ताओं से लेकर विश्लेषक तक “अस्पष्ट” बोलने में अपनी शान समझते हैं। यह जान कर भी कि उनके अशुद्ध उच्चारण ने शब्द का अर्थ ही उलट दिया है। उसे मूल शब्द का विलोम बना डाला है। “स्पष्ट” बोलते में शुरुआत “अ” के बजाय “इ” पर ज़ोर देकर की जाए तो उच्चारण सही हो सकता है, पर इन मूर्खों को अर्थ के अनर्थ का इल्म तो हो पहले। यही स्थिति तमाम शब्दों की है, जिनके बेज़ा उपयोग के लिए सिर्फ और सिर्फ मीडिया दोषी है। आज की शिकायत का केंद्र बिंदु यही है।
शाश्वत अवधारणा है कि “शब्द ब्रह्म होते हैं, जिनका नाद कालजयी होता है।” टिल को ताड़ और राई को पहाड़ बनाने की सामर्थ्य भी शब्द ही रखते हैं। विडम्बना की बात है कि इस सच्चाई से निरंकुश इलेक्ट्रॉनिक मीडिया शायद पूरी तरह से अनभिज्ञ है। उसे इस बात की भी कोई परवाह नहीं कि उसके द्वारा प्रयुक्त शब्द किस हद तक अनुपयुक्त हो सकते हैं। यही हाल व्याकरणीय त्रुटियों का है, जो नई पीढ़ी के भाषा बोध को विकृत बना रहा है। साथ ही भाषा के मानकों को नष्ट भ्रष्ट करने में संलग्न है। किसी आक्रांता विदेशी शासक की तरह। एक समय तक भाषा को नए तेवर देने वाली मीडिया आज भाषा का शील भंग करने पर आमादा है। जिसमें प्रिंट, वेब व सोशल मीडिया से ऊपर ई मीडिया है। जिसके एंकर से लेकर ग्राउंड रिपोर्टर तक भाषा के सौंदर्य को आए दिन ग्रहण लगा रहे हैं।
प्रसंग में है देश के हृदय प्रदेश की एक आपराधिक घटना और उसे लेकर की गई रिपोर्टिंग। जिसमे समाचार चैनल के रिपोर्टर और एंकर ने आरोपी के लिए बिना सोचे-विचार “मानसिक विक्षिप्त” शब्द का कई बार उपयोग किया। देश के इस वैधानिक सच को भुलाते हुए कि “मानसिक विक्षित” को जघन्य अपराध का भी दंड नहीं दिया जा सकता। यह एक ऐसा शब्द है, जिसका प्रयोग नृशंस मामलों में बचाव पक्ष के धूर्त व शातिर बक़ील सोची समझी चाल के तहत करते हैं। ऐसा प्रयोग खास कर नाबालिग अपराधियों के पक्ष में उनकी पैरवी करने वालों के द्वारा किए जाने का मुल्क़ में प्रचलन है।
एक निरीह को मौत के घाट उतारने वाले बेरहम हत्यारे को आदतन “उन्मादी” के बजाय विक्षिप्त बताना वस्तुतः एंकर और रिपोर्टर का अपना “मानसिक दिवालियापन” था। जिसने एक अपराधी को बचाव के लिए एक सर्टीफिकेट देने का अपराध जाने-अंजाने कर दिया। कोई अचरज नहीं होना चाहिए, यदि काले कोट इस एक शब्द की बिना पर अदालत को हर बार की तरह फिर से गुमराह करने में कामयाब हो जाएं। जिसकी आंखों से पट्टी हट जाने का कोई सकारात्मक असर अभी तक तो नज़र नहीं आया है। न्याय की देवी के हाथ से गायब हुई तलवार भी शायद यही संकेत देती है कि अपराध करो और सज़ा की जगह सुधार की कवायद का मज़ा लो। वो भी उधार में नहीं, मुफ्त में।
कुछ समय पूर्व सज़ा-ए-मौत पाए तीन दरिंदों की रिहाई के एक मामले ने न्याय की बुनियाद को हिलाने का काम पहले ही कर दिखाया था। ऐसे में एक और जघन्य मामले को हल्काने का यह मीडियाई प्रयास किसी भी नज़रिए से स्वीकार जाने योग्य नहीं। सड़क पर खड़े होकर वकील, विवेचक और न्यायाधीश की भूमिका एक साथ निभाने वाली चैनली मीडिया को अपनी हदें अब खुद समझनी होंगी। ताकि देश भर की छोटी-बड़ी अदालतों में बाढ़ की तरह आने और सालों साल चलने वाली न्यायिक प्रक्रिया दिग्भ्रमित न हो। अपराध और अपराधी उतावलेपन में हुई ऐसी भूलों से रक्षा के कवच-कुंडल न पाए और इंसाफ़ की लड़ाई का पटाक्षेप नाइंसाफी की दुखांतिका के साथ न हो। शब्द प्रयोग को लेकर बेपरवाह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ऐसी चेष्टाओं के विरुद्ध अब समयोचित प्रावधान भी बेहद ज़रूरी हैं, ताकि रिपोर्टर का काम केवल रिपोर्टिंग ही हो। धारणाओं का प्रजनन और प्रसार नहीं।
आवश्यकता अब इस बात की भी है कि मीडिया हाउस अपने घटिया स्तर की खुली नुमाइश से बाज़ आएं और अपने प्रोड्यूसर व राइटर से लेकर एंकर व रिपोर्टर तक को भाषा के प्रति सजग होने की समझाइश दे। आप रोज़ सुनते होंगे उन नामचीन एंकर्स को जिन्हें “उपद्रव” तक बोलना नहीं आता। जिन्हें हर मिनट आठ से दस वाक्यों के बीच चार चूक करने की आदत पड़ चुकी हे। शब्द के जेंडर तक की समझ न रखने वाले एंकर आए दिन अपना उपहास ख़ुद उड़वाते हैं, स्त्रीलिंग को पुल्लिंग व पुल्लिंग को स्त्रीलिंग में बदल कर।
गनीमत की बात यह है कि अभी टीव्ही में घुस कर गला दबोचने या जूते जड़ने की तकनीक अस्तित्व में नहीं आई। वरना ये हर दिन एक्सरे व मरहम पट्टी कराते दिखाई देते। भगवान इन्हें समय रहते सद्बुद्धि दे ताकि शब्द, भाषा और व्याकरण की अशोक वाटिका अकारण उजड़ने से बच सके। आगे भगवान भला करे।
संपादक
न्यूज़&व्यूज
श्योपुर (मध्यप्रदेश)