'द्विज' का यथार्थ अर्थ हमें जोड़ता है: सावन
विश्व बंधुत्व हेतु जाति सूचक शब्दों से बचें
‘द्विज’ शब्द में समष्टि सृष्टि समायी हुई है। इसमें अद्भुत चेतन-शक्ति है जो अनमोल जीवन को प्राणवान बनाती है। इसके वास्तविक एवं व्यापक अर्थ को समझना हमारी मानवीय जिम्मेदारी है। इसका वास्तविक अर्थ बहुत ही सारगर्भित है जो हमें जोड़ता है। इसमें जीवन की गहराई है और चेतना का सौन्दर्य है। जिस प्रकार द्विज का अर्थ समग्र दन्त और समग्र अंडज प्राणी होता है, उसी प्रकार द्विज का अर्थ समग्र मानव प्राणी होता है। जिन-जिन प्राणियों में जन्म के पश्चात् संस्कार विकसित होता है वे सभी द्विज हैं। इसीलिए मैंने पहले ही घोषित कर दिया है कि द्विज शब्द में समष्टि सृष्टि समायी हुई है।
द्विज का शाब्दिक अर्थ है- दो बार जन्म लेने वाला। ‘द्वि’ अर्थात् दूसरी बार, ‘ज’ अर्थात् जन्म लेने वाला।। दूध का दांत टूट कर दोबारा जन्मता है इसीलिए वह द्विज कहलाता है। अंडज प्राणी अर्थात् सांप, पक्षी इत्यादि भी द्विज कहलाते हैं क्योंकि इनका जन्म पहले अंडा के रूप में होता है, फिर अंडा से शरीर के रूप में होता है। चांद को भी द्विज कहा जाता है। यदि चांद द्विज है तो यह जीवन भी द्विज है क्योंकि जीवन और चांद की कहानी एक जैसी है।
मानव प्राणी द्विज है क्योंकि वह अपने जीवन काल में दो बार जन्म लेता है। पहले शारीरिक स्तर पर और फिर बौद्धिक एवं संस्कार स्तर पर। 9 माह गर्भ में पलने वाला शिशु जब पैदा होता है तब उसमें पर्याप्त् बुद्धि, संस्कार एवं सोच नहीं होती है। इस मृत्यु लोक में कुछ दिन जीवन यापन करने के पश्चात् उसका बौद्धिक विकास होता है और उसमें शनै-शनै संस्कार के बीज पल्लवित-पुष्पित होने लगते हैं। यह उसका दूसरा जन्म होता है। इसीलिए समग्र मानव प्राणी द्विज है।
द्विज शब्द का संकुचित एवं सांकेतिक अर्थ हमें दिग्भ्रमित करता है, हमें जातिवादी बनाता है। जातिवाद मानव जीवन के लिए सबसे गंभीर खतरा है। विश्वबन्धुत्व एवं लोक-कल्याण हेतु हमें अपने नाम के साथ जाति सूचक शब्द बिल्कुल नहीं लिखना चाहिए। जाति मोहमय जंजीर है जो हमें बांधती है। यह वह पिंजरा है जो हमें कैद करती है और जीवन के उन्मुक्त गगन में उड़ान भरने से रोकती है। हम सब एक हैं और नेक हैं।
हमारी एक ही जाति है- मानव, और एक ही धर्म है- मानवता। इसी में समझदारी है, बाकी सब दुनियादारी है। द्विज शब्द का यथार्थ अर्थ हमें जोड़ता है। जुड़ाव ही ज़िन्दगी है। एक बनें,नेक बनें।
डॉ. सुनील ‘सावन’