मैं अपनी कलम से वही लिखता हूँ
मैं अपनी कलम से वही लिखता हूँ
जिससे किसी बेबस को उसका हक़–अधिकार मिल जाए।
मैं कवि शाज़ हूँ…
ज़ुल्म की रातों में भी सच की एक चिंगारी बचाए रखता हूँ।
मैं अपनी कलम से वही लिखता हूँ
जिससे किसी बेबस को उसका हक़–अधिकार मिल जाए।
मैं कवि शाज़ हूँ…
ज़ुल्म की रातों में भी सच की एक चिंगारी बचाए रखता हूँ।