विषहर चंद्र
///विषहर चंद्र///
अनंत विस्तार वाला नीलवर्ण पट
संपूर्ण ग्रह नक्षत्रों का नियंता आकाश तत्व
शुद्ध और निर्विकार है
सर्वत्र आयतन युक्त है
अर्धरात्रि में
नील वर्णपट के मध्य
पूर्ण वर्तुल चंद्र
अपनी शीतल रश्मि से
शांति और स्निग्धता का वर्षण कर रहा है।।
मैं एक चट्टान पर खड़ा दर्शक
पास ही जान्हवी के अमृत पीयूष का धाराप्रवाह कितना पवित्र
देता शुद्ध शीतलता का संचार
निष्पलक एकटक नयन दृष्टि
उसी का चिंतन करती है
प्रकाशमय तेजो मंडल एक नहीं अनेक
फिर फिर प्रकट होते हैं
चंद्रमा अपनी रूप राशि को
मानो अनेकों शशियों में तोड़ देना चाहता है
किंतु सहम-सहम कर एक में ही सिमट पड़ता है।।
पूर्णिमा के वर्तुल चंद्र की आभा को
तारक गण एकटक निहार रहे हैं
किंतु चंद्र अपनी अविराम गति से
चलता चला जा रहा है
अमृतमय रश्मियों की परम शीतलता का विस्तार कर रहा है
स्निग्धता के
मनोभाव उठते हैं और उठते ही जाते हैं
प्रभु शंकर का विषशमन करता यह चंद्र
विष की विषता को निष्क्रिय कर देता है।।
सकल औषधीयों का नियंता है यह
तभी तो प्रभु शिव को भी
चंद्रमा की धारणा लेनी पड़ी
और आज भी वे स्थित हैं शिव शिश पर
प्रभु के भाल पर मस्तक पर
जिसे धारण कर प्रभु शिव ने सहनशक्ति प्राप्त की
और बचा लिया विश्व को विषमय होने से
मानव को और देवों को मरण से
धरा और स्वर्ग में आल्हाद छा गया
जिसे स्वयं प्रभु विष्णु ने अपने कर कमलों से अमृत पान कराया
धन्य धन्य हो अमृतपायी शशि।।
अमृत पायी शशि
स्वार्थी नहीं परमार्थी है
आज भी अमृत की वर्षा करता है
कैसी मधुरिम वह शरद की पूर्णिमा
जब शशि स्वयं मृत्यु लोक पर भी
स्निग्ध अमृत चुवाते हैं
असीम मधुरता शांति का साम्राज्य दे जाते हैं
इस संघर्ष भरे मृत्यु लोक पर
कितनी अतुल दानशीलता दिखाते हैं।।
दानवों ने जो मृत्यु लोक की सुख शांति नष्ट करने का यत्न करते हैं
उनने पाया कि स्वास्थ्य और शांति का दाता चंद्र है
तो अमृत चुरा लिया
और अमरता पाने का यत्न किया
इसीलिए तो दानवी प्रवृत्ति ने मानवों में घर कर लिया है
फिर भी चंद्र अमृत जीवी है
और असीम शक्तिपुंज है।।
अमरता के गर्व से राहु
राक्षस राज की आज्ञा से
समय-समय पर चंद्र को ग्रसता है
किंतु चंद्र तो अमृत जीवी है
वे उसकी चिंता किए बिना विचरण करते हैं
कैसी अहिंसक दयामय प्रकृति है
राहु ग्रसता है किंतु सिद्ध अहिंसा भाव के सम्मुख झुक जाता है
कुछ भी नहीं बिगाड़ पाता चंद्र का
चंद्रमा अपनी स्निग्धता लिए
शांति और मधुरता का जग को
और जगवासियो को संदेश देता है।।
शशि स्वयं ज्ञानी शांतिदूत संयमी और सर्व पूज्य हैं
फिर भी शशि ने अहिल्या के सतीत्व हरण में सहयोग किया था
कैसी विडंबना है मन की
एक ज्ञानी सतीत्व हरण का सहयोग करे
कभी गुरु बृहस्पति के पत्नी संग कामातुर हो गमन करे
कैसा फेर वह गुरु पत्नीगामी हुआ
शांति मधुरता का पोषक शीतलता का दायक सर्वत्र वंद्य चंद्र कर्मपाती हो जाए
विडंबना
कितना पतन था
एक महनीय व्यक्तित्व गुरु पत्नीगामी हो।।
सच है जब विवेक खो जाता है
तब मानव का पतन होता है
ज्ञानी होकर भी पतन संभव है
विवेक हीन होने पर,
मानव विवेक ही तेरा सद्-मार्ग का पोषक है
विवेक युक्त हो जा फिर कभी पतित नहीं होगे
तब ही वंदनीय बने रहोगे ।।
स्वरचित अनुशील रचना
रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)