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16 Nov 2025 · 6 min read

महा शशिवदना छंद विधान सउदाहरण

महा शशिवदना छंद
10 – 10 मात्रा , यति और पदांत दीर्घ से,
(दीर्घ का वाचिक लघु -लघु करना निषेध है )
चार पद , दो दो पद अथवा चारों पद समतुकांत।

सरल विधान – अठकल+दीर्घ, –अठकल +दीर्घ।

अठकल के बारे में कई बार , विस्तृत निवेदन कर चुके हैं।
सही अठकल – 44. 332. 35 ✅✅ और 35 के अठकल में भी त्रिकल के बाद #तगण 221 #सही_नहीं होता।

विद्रूप /गलत – अठकल – 233. 323. 53 ❌ लय‌ हनन
(विद्रूप अठकल का प्रयोग करना ,छंद लेखक की अकुशलता है)
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यह निषेध शब्द हम इसलिए प्रयोग करते हैं, कि करीब दो सौ छंदों के साथ वर्तमान के एक तथाकथित जी ने‌ घाल मेल कर दिया है, सर्व मान्य छंद पुस्तक “छंद प्रभाकर ” ( ले० जगन्नाथ प्रसाद भानु) में वर्णित छंदों में , दीर्घ का वाचिक दो लघु कर दिया , तो कही दो लघु का दीर्घ कर दिया व कुछ छंदों को ऐसा ही कुछ करके ,उसके जनक प्रणेता बन गए हैं | हम प्रयास करते हैं, कि वर्णित लघु – दीर्घ यथावत रहें |सरलीकरण एवं स्व यश नाम के लाभ में छंदों की मूँछ हटाकर पूँछ लगाना हम उचित नहीं मानते।👏👏👏

पूज्य जगन्नाथ भानु जी लिखते भी हैं कि-
मत्त वरण गति यति नियम, अंतहि समता बंद ।
जा पद रचना में मिले, “भानु” भनत स्वइ छंंद ।।

मत्त = मात्रा ,,, वरण = वर्ण ,
“मात्राओं व वर्णों की रचना गति तथा यति का नियम और चरणाांत में समता /पदांत नियम जिस कविता में पाई जावे, उसे छंद कहते हैं ।”
छंद की पहचान इन्हीं लक्षणों के आधार पर की जा सकती है—
किसी छंद (एक ही प्रकार के छंद) में मात्राओं अथवा वर्णन की निर्धारित संख्या होती है ।
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🌹🥗 माँ शारदे वंदना 🥗🌹

वीणा है कर में, नमन करूँ माता |
हंसवाहिनी हो , शब्दों की दाता ||
शरण आपकी दे,जिसको भी छाया |
ज्ञान सदा मिलता , ऐसी तव माया ||

सुन लेना माता , सेवक की विनती |
शरण ‘सुभाषा’ की,चरणों में गिनती |
छंद महल सज्जा , कृपा तुम्हारी है |
हर कवि में तेरी , ममता न्यारी है ||

🌹🥗 श्री गणपति अर्चना 🥗🌹

प्रथम पूज्य सबके, जय गणपति देवा |
सुर, नर, मुनि करते , तेरी नित सेवा ||
भोले शंकर जी , पिता तुम्हारे हैं |
सुत माता गौरी , आप हमारे हैं ||

🌹 महा शशिवदना छंद संरचना 🌹

छंद सुहाना है , रुचिकर शशिवदना |
महा शब्द पहले ,‌रहता है कहना ||
यति-पदांत गुरु है, दस-दस शुभ मात्रा |
समझें कवि ज्ञानी , शशिवदना यात्रा ||

शशिवदना लगता , छंद सुहाना है |
महा कहें पहले , गेय‌ खजाना है ||
कलन सही मिलते , गायन में लेखा |
वाद्य थाप चलती , यह भी सब देखा ||

🌹 अपनी बात / नम्र निवेदन 🌹
हम सुभाष करते, कौशिक से चर्चा |
तभी छंद लाते , सही बना पर्चा ||
मिलकर दोनों का , एक किनारा है |
छंद महल तब ही , बना सितारा है ||

🌹. महा शशिवदना छंद 🌹

जीवन जब पाया, कुछ करके जाना |
संकट भी सहना , पर मत घबराना ||
सत्य सदा रखना, धीरज अपनाना |
रखकर विनम्रता , निज यश फैलाना ||

चार भले अच्छे , खल बारह छोड़ो |
मानी यदि ज्ञानी , उससे मुख मोड़ो ||
संगत दे कटुता , तब रिश्ता तोड़ो |
गुण रखते हैं जो , उनको ही जोड़ो ||

जीत वही अच्छी , जिसमें सच्चाई |
यदि बेईमानी , की कुछ परछाई ||
चैन नहीं मिलता , रहती व्याकुलता |
लज्जित भी होते , भेद जहाँ खुलता ||

जब हाथी चलता , श्वान भौंकते हैं |
यश सुन ज्ञानी का , दुष्ट चौंकते हैं ||
खल फितरत करते, जाल बनाते हैं |
रस में विष घोलें , गाल बजाते हैं ||

सुभाष सिंघई
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🌹. महा शशिवदना छंद ( मुक्तक) – 🌹

कुछ जन मिलते हैं ,चमचागिरि करते |
निज मतलब साधें , रहते दम भरते |
घातें वह देते , स्वारथ ही साधें-
सज्जन चुप रहते , रह लेते डरते |

कह”सुभाष” आगे, जो रिश्ते मिलते |
कुछ खुश्बू देते , कुछ लगते हिलते |
उन्हें निभाना भी , होती मजबूरी –
कभी वही अच्छे , बनके भी खिलते |

हम सबसे अच्छे ,जो पीटें डंका |
उन पर ही करते , जन पहले शंका |
काले को कहते , हैं पीला सोना-
उनकी ही जलती , पहले से लंका |

सुभाष सिंघई
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🧶महा शशिवदना छंद🧶
📣गीत 📢

अब सबसे न्यारा , देश हमारा है |
हर सैनिक जानो ,एक सितारा है ||

अरिदल भी डरता , थर- थर वह काँपे |
ताकत है कितनी , बैठा वह भाँपे ||
गीदड़ बन जाता , भभकी भर देता |
छिपकर भी रहता ‌, लोह नहीं लेता ||

जय भारत माता , गुंजित नारा है |
हर सैनिक जानो , एक सितारा है ||

दुश्मन मिल जाते चीन- पाक जानों |
कुंठाएँ रखते , भारत से मानों ||
हिंदुस्तानी भी , प्रत्युत्तर देते |
सबक सिखाते हैं , बदला भी लेते ||

चला शत्रु लड़ने , तब-तब हारा है |
हर सैनिक जानो , एक सितारा है ||

सदा विश्व में भी, अलख जगाया है |
भारत का झंडा , शुभ फहराया है ||
शांति दूत हम हैं , दुनिया ने जाना |
आदर्शों को भी , शुभकर है माना ||

विश्व गुरू बनने , अब जयकारा है |
हर सैनिक जानो, खिला सितारा है ||

सुभाष सिंघई
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🧶महा शशिवदना छंद🧶
📣गीत 📢

राधा यमुना में , पैर युगल डाले |
चला रही चप्पू , वह बैठे-ठाले ||

नहीं श्याम आए , वादा भी तोड़ा |
आज अकेले ही , राधा को छोड़ा ||
मौन आज धारा , है उदास बहती |
दर्श कृष्ण चाहूँ ,यमुना भी कहती ||

दर्शन सुख देगा , यह इच्छा पाले |
चला रही चप्पू , वह बैठे-ठाले ||

उपवन के पत्ते , आज नहीं हिलते |
यहाँ श्याम बिन भी, नहीं कमल खिलते ||
मोर देख लौटे , नहीं श्याम आए |
विरह मोरनी का , कौन समझ पाए ||

सब जड़वत लगता , लगे मौन ताले |
चला रही चप्पू , वह बैठे – ठाले ||

हंस किनारे हैं , करें नहीं क्रीड़ा |
कौन समझता है , अब उनकी ‌पीड़ा ||
है उदास चकवी , मन में अब रोती |
खोज रही चकवा , यादों में खोती ||

दूर खड़े देखें , कृष्ण सखा ग्वाले |
चला रही चप्पू , वह बैठे-ठाले ||

सुभाष सिंघई
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💎महा शशिवदना छंद💎
🔔गीतिका 🔔 स्वर समांत आन , पदांत गंदा

दर्प रखे ज्ञानी वहाँ ज्ञान गंदा |
बंद सीप मोती , सभी मान गंदा ||

पानी-सा ज्ञानी, निर्मल रहता है ,
मन सरिता मैली, लगे पान गंदा |

बतलाता सबको , है उसूल कितने ,
पर चुगली सुनके, किया कान गंदा |

अब पाखंडी ही , सुख साधन चाहें ,
पुण्यवान बनते , सुने गान गंदा |

जहर बेल बढ़ती , बिन पानी जानो ,
भेंट दिया जिसको, किया दान गंदा |

छिपे छिपकली भी , प्रभु चित्रों पीछे ,
रही यथा मंशा , है ढ़लान गंदा |

क्यों करता गिनती , चल सुभाष घर को ,
बनी शोहरत का , किया शान गंदा |

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
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🌹महा शशिवदना छंद🌹
🎈गीतिका 🎈 ( अपदांत )

सज्जन गुण ज्ञानी ,अक्सर चुप रहते |
जहाँ उचित लगता ,बात वहीं कहते |

लोग बोलते जो , हम बढ़कर सबसे ,
वह खाली डिब्बा , से हरदम बजते |

शेर सभी बनते , राजा सब घर के ,
आहट दरवाजे , तब दिखते डरते |

सबने यह देखा , हँसी उड़़ाते जो,
जब वह ही घिरते, रहें हाथ मलते |

चलना बस सीखो , यह जग है मेला ,
बुरे और अच्छे , मिलते हैं चलते |

भला बुरा करते , अवसर जब मिलता ,
करें याद नानी , जब खुद ही ढलते |

कभी ‘सुभाषा’ तू , बुरा नहीं करना ,
जैसे को तैसा , देखा है सहते |

सुभाष सिंघई
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🌹महा शशिवदना छंद🌹
🎈गीतिका 🎈 ( अपदांत )

खुले आम ही जो , देश गीत गाते |
तब आकर उनसे, रखते सब नाते ||

चोरों की टोली , करती गद्दारी ,
बनकर भक्षक ही , रक्षक बतलाते |

खाना भारत का , गाना पाकिस्ताँ ,
लाठी इनको ही , कुछ जन बनवाते |

शर्म हया बेची , कुछ नेताओं ने ,
खातिर वोटों की , कलमा पढ़‌ जाते |

राजनीति अब है , बस फितरत बाजी ,
नेता जनता को, सीधा ही खाते |

आज धमाकों को , सुनते हर कोने ,
बम्ब फोड़ मरते , जनता ठुकराते |

धर्म बना कैसा , काफिर कह मारो ,
मरने पर हूरें , मिलना दुहराते |

मांँ शारदे से प्रार्थना (मुक्तक)

🌹मुक्तक -🌹
बात सुनो मेरी , नम्र भाव कहता |
नहीं मान कुछ मैं , निज मन में रखता |
देता आदर हूँ , सबको मन से ही –
जो रखते कटुता , उन्हें नहीं सहता |

जलती आगी के ,भाग नहीं मिटते |
जहाँ काज खोटे , दाग नहीं मिटते |
जब चरित्र फिसले, बलबूजे उठते –
तब आसानी से , झाग नहीं मिटते |
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🌹महा शशिवदना छंद (गीत )🌹

अब इस दुनिया में , कुछ करके जाना |
लगन परिश्रम से , सब कुछ है पाना ||

लोग सयाने हैं , कान खूब भरते |
तिकड़म करने से , नहीं कभी डरते |
उठा भरोसा है , अब तो अपनों ‌से –
देते वह धोखा , जो सँग में रहते |

तब विवेक आगे ,‌सम्मुख कुछ लाना |
लगन परिश्रम से, सब कुछ है पाना ||

दुनियादारी में , सीखो अब जीना |
कभी हलाहल भी , पड़ता है पीना |
लोग जलाकर ही , तारीफें करते –
अवसर पाते ही ,छेद करें सीना |

तब बचकर रहना , नहीं जाल आना |
लगन परिश्रम से, सब कुछ है पाना ||

लोग चले आते , जब स्वारथ होता |
अपनापन दिखला, दुखड़े भी रोता |
स्वारथ सध जाए,तब सब कुछ भूले –
दूर खड़ा देखे , या कटुता बोता |

अब सुभाष गाता , तन्मय हो गाना |
लगन परिश्रम से , सब कुछ है पाना ||

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🌹गीतिका 🌹

जहाँ भरोसा हो , तुमको निज बल का ‌|
करो सामना भी , डटकर तुम छल का |

नहीं चूकते हैं , लोग जमाने के ,
खेल बिगाड़ो जी , सदा आप खल का |

ऊँचाई चढ़ना , अपने साहस से ,
मजबूती रखना , सदा खड़े तल का |

लोग आज जीतें , मनमानी करते ,
मौज उड़ाते हैं , ध्यान नहीं कल का |

सज्जन रहते हैं , सदा एक से ही,
कब करती लाठी , बँटवारा जल का |

पक्षी उड़ते हैं , नील गगन में ही ,
ध्यान रखें नीचें , हिस्सा वह थल का |

संत सदा होते , परहित उपकारी ,
हैं हिसाब रखते, वह भी हर पल का |

सुभाष सिंघई
जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

सुभाष सिंघई
जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
एम० ए० हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र
पूर्व भाषानुदेक आई टी आई
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