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15 Nov 2025 · 1 min read

दोहा पंचक. . . . . दर्पण

दोहा पंचक. . . . . दर्पण

दर्पण देखा तो हुआ, दिल को यह अहसास ।
पतझड़ बैरी उम्र का, छीन गया मधुमास ।।

दिल दर्पण के सत्य को, कब करता स्वीकार ।
अपने बदले रूप से , उसे रहा इंकार ।

दर्पण से कब कुछ छुपा, सब कुछ दिखता साफ ।
दिल ही उसके सत्य से, रहता सदा खिलाफ ।।

दर्पण तो है सत्य का, सच मानो अवतार ।
छद्म कभी कब छुप सका, वह होता साकार ।।

दर्पण को यूँ व्यर्थ में, क्यों देते हो दोष ।
देख रूप को सत्य का, वह करता उद्घोष ।।

सुशील सरना / 15-11-25

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