Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
14 Nov 2025 · 3 min read

#प्रसंगवश-

#प्रसंगवश-
■ आपके न बच्चे सुरक्षित न बाल।
[प्रणय प्रभात]
वैमनस्य और घृणा की राजनीति ने मासूम बच्चों से उल्लास का एक दिन करीब एक दशक पहले छीन ही लिया था, जिसका अब नाम-निशान तक भी बाक़ी न रहने देने का संकल्प ठान लिया गया है। फिर भी, जो लोग व संस्थान अपने स्तर पर इसे मना रहे हैं, उन्हें सोचना चाहिए कि क्या आज के परिवेश में इस एक दिवस की कोई सार्थकता बची है। ऐसे माहौल में जब, स्कूल वैन से लेकर स्कूल के वॉशरूम तक मासूम बचपन सुरक्षित नहीं। इस दौर में जब बचपन यातनाओं के बीच आत्मघात तक की कगार पर आ पहुंचा है। कथित नई शिक्षा नीति के उस शर्मनाक दौर में, जहां अपने वज़न से भारी बस्ता उठा कर बचपन स्कूल की ओर भागता नहीं, रेंगता या घिसटता सा दिखाई देता है।
फोकटियों व रेवड़ीखोरों की आबादी बढाने में स्पर्द्धा कर रहीं केन्द्र व राज्य की सरकारों ने देश की आदर्श शिक्षा प्रणाली को संशय व अनिश्चितता के उस चौराहे पर ला कर खड़ा कर दिया है, जहां बच्चों से लेकर अभिभावक तक बौराए हुए हैं। कथित नवाचारों की प्रयोगशाला में आधुनिक शिक्षा सतमासे शिशु के भ्रूण की भांति परखनली में पड़ी नज़र आ रही है। शिक्षक तुगलक छाप नेताओं और निरंकुश नौकरशाही की रस्साकशी के बीच “वासुकी नाग” की तरह विवश बने हुए हैं। रिमोट पर निर्भर रोबोट की तरह। जिनके लिए न शिक्षा का मंदिर अब मंदिर रहा है न न्याय का मंदिर।
कपोल कल्पित अमृत के अर्जन के नाम पर अरबों के खर्चे से योजनाओं का सागर मथा जा रहा है। निकल रहा है केवल और केवल “कालकूट।” जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, नस्ल, लिंग जैसे भेद की आड़ में। महादेव अंतर्ध्यान हैं और महादानव दृष्टिगत, जो सब कुछ लील जाना चाहते हैं। सिवाय उस हलाहल के, जो भावी पीढ़ियों व उन्हें ऊंचाई देने वाली सीढ़ियों के लिए ही निकला है शायद।
ऐसे में लगता है कि ठीक ही किया गया बचपन से बाल दिवस छीन कर। उसका औचित्य भी क्या था आज के हालात में? जब 20 फीसदी को छोड़ कर बाक़ी को छला भर जा रहा है। मुफ़्त के उस पाठ्यक्रम के नाम पर, जो खर्चीला हो कर भी सीख-रहित है। ख़ैरात रूपी उस मध्याह्न भोजन के नाम पर, जो आम दिनों में स्वाद और सेहत से कोई सरोकार नहीं रखता। उन सौगातों के नाम पर जिनसे सियासी स्वार्थ की सड़ांध उठती है। जो बच्चे इस विद्रूप के बीच अपनी मेधा व मेहनत के बल पर सफलता पाने में कामयाब हो जाते हैं, उनकी उपलब्धि पर मोबाइल, टेबलेट, लेपटॉप व सकूटी के टैग लटका कर सरकारें सारा मजमा लूट लेती हैं और शिक्षा के नाम पर साल भर कमीशन व मुनाफाखोरों के हाथों लुटने वाले मां-बाप गदगद भाव से कृतार्थ होकर षड्यंत्रकारी तंत्र के आगे नतमस्तक नज़र आने लगते हैं। जंगलराज में उन मूर्ख व मुंडी हुई भेड़ों की तरह, जो अपने ही बालों से बना कम्बल पाकर धन्य हो जाती हैं। वो भी उन रंगे सियारों व भूखे भेड़ियों के हाथों, जिनकी दृष्टि उनके बाद उनके अपने मेमनों पर है। खाल उधेड़ने और बाल नोचने के लिए।
आज इसलिए तो कहना पड़ रहा है कि बंद करो विकृत और विसंगत परिदृश्यों में इतिहास बन चुके बाल दिवस के प्रपंच। अब मनाना इतना ही ज़रूरी हो तो तब मनाना बाल दिवस, जब मासूम बचपन को दिला सको पढ़ाई के नाम पर जारी असमानतापूर्ण व शर्मनाक परिदृश्यों से छुटकारा। जब समझ सको अपने व अपनी नस्लों के साथ बरसों से जारी लूट व षड्यंत्र के खेल को। फ़िलहाल, आराम से सो लो। आने वाले कल में पूरी सामर्थ्य से रोने के लिए। तय है कि न आप सुधरना चाहेंगे, न वो सुधारना। भेड़ें होंगी, तभी तो परवान चढ़ेगा ऊन का कारोबार। जहां तक अपना सवाल है, अपन यक्ष की तरह सवाल उठाते रहेंगे। प्रसंगवश मानें या प्रयोजनवश, मर्ज़ी आप की।
आज की बात का समापन नई पीढ़ी के लिए स्लो-पॉइजन के विरुद्ध इस एक स्लोगन के साथ:-
“एक ही इच्छा। समान शिक्षा।”
फिलहाल, निवेदन बस इतना सा कि कल के बारे में आज सोचिए। उस कल के बारे में, जिसमें न आपके बाल गोपाल सुरक्षित हैं, न आपकी अपनी खोपड़ी के बाल। अब भी मन करे तो बोलते रहें “जय दिल्ली, जय भोपाल।।”

👌👌👌👌👌👌👌👌
●संपादक●
[न्यूज़&व्यूज़]
श्योपुर (मध्यप्रदेश)

Loading...