*आशा का भारत : समकालीन राजनीति पर कविता*
नयी सदी का भारत जागा,
सपनों ने फिर रत्न माँगा।
नीति, निष्ठा, नव-आयामों में,
जन-मन ने विश्वास जगाया।
युवाओं की आँखों में शक्ति,
रोज़गार की बढ़ती आकांक्षा।
नेता अब सुनने को तत्पर—
संवादों की नयी परिभाषा।
डिजिटल युग के नये प्रकोष्ठ,
पारदर्शिता के खुलते द्वार।
भ्रष्ट चलन पर प्रहारों की,
गूँज रही अब सत्य की पुकार।
ग्रामीण पथ से लेकर नगरों तक,
विकास की धुन एक समान।
सड़कें, शिक्षा, स्वास्थ्य-संरचना—
सबको मिले उन्नति का मान।
महिलाओं की बढ़ती भागीदारी,
सशक्तिकरण का सूरज ताज़ा।
राजनीति में साहस की धारा,
न्याय और सम्मान की भाषा।
नीति-मंच पर नई बहसें,
पर्यावरण की चिंताओं संग।
हरियाली की राह चुनें हम,
बने विकास का हरा पतंग।
विश्व-पटल पर भारत खड़ा,
स्वाभिमान से ऊँचा सिर।
शान्ति, सहयोग, संस्कार लेकर—
मृत्युंजय-सा विस्तृत निखर।
जनता ही लोकतन्त्र की धुरी,
वही दिशा, वही है ध्वनि।
आशा, श्रम, समन्वय मिलकर—
रच देंगे नये युग की गाथा अनुग्रही।