"शाज़" जब भी (कवि शाज़)
“शाज़” जब भी (कवि शाज़)
क्रांति भूमि या पंचकठिया क्रांति स्थल पहुँचता हूं,
तो ऐसा लगता है मानो आज भी
वीरों की पुकार गूंज रही हो,
यह धरती अब भी वीरगति का कंपन महसूस करती हो।
“शाज़” जब भी (कवि शाज़)
क्रांति भूमि या पंचकठिया क्रांति स्थल पहुँचता हूं,
तो ऐसा लगता है मानो आज भी
वीरों की पुकार गूंज रही हो,
यह धरती अब भी वीरगति का कंपन महसूस करती हो।