मोबाइल छोड़ा, तो मिले अपने
बाल आलेख…
आज मोबाइल हमारे जीवन का ज़रूरी हिस्सा बन चुका है। सुबह उठते ही हम सबसे पहले मोबाइल उठाते हैं…कभी अलार्म बंद करने के लिए, कभी मैसेज, इंस्टाग्राम, फ़ेसबुक देखने के लिए, तो कभी गेम खेलने के लिए। रात को सोने से पहले भी मोबाइल हमारे साथ ही होता है।
अब स्थिति यह है कि हम लोग मोबाइल के आदी हो चुके हैं। आपने कभी सोचा है, अगर एक दिन मोबाइल न हो तो क्या होगा? पिछले रविवार मैंने यही प्रयोग किया। मैंने खुद से कहा; ‘आज का दिन बिना मोबाइल के! देखता हूँ क्या होता है।’ शुरू में थोड़ा अजीब लगा। बार-बार जेब में हाथ जा रहा था, जैसे कोई चीज़ गुम हो गई हो। मन में आया ‘अगर किसी का फ़ोन आया तो?’ फिर सोचा: ज़रूरी बात सामने से भी कह सकते हैं!
आख़िरकार मैंने तय कर ही लिया कि आज मोबाइल नहीं उठाऊँगा। माँ रसोई में थीं। मैंने कहा; ‘माँ, आज मैं आपकी मदद करूँ?’ माँ मुस्कुराईं, ‘वाह! आज सूरज किधर से निकला है?’ मैंने सब्ज़ियाँ काटीं, फिर अपने कमरे की सफाई की, किताबें सजाईं, बचपन के पुराने खिलौने देखकर मन रोमांच से भर गया। पापा ने कहा; ‘चलो बेटा, ताश खेलते हैं।’ हम दोनों ने खूब खेला और हँसी-मज़ाक किया।
दोपहर में दोस्तों के साथ पार्क गया। हमने क्रिकेट खेला, झूले झूलते रहे, पेड़ के नीचे बैठकर बातें कीं। किसी के हाथ में मोबाइल नहीं था। फिर भी सब हँस-खेल रहे थे, दौड़ रहे थे, खुश थे। शाम को जब छत पर बैठा, तो आसमान बहुत सुंदर लग रहा था। हवा के झोंके चेहरे से टकरा रहे थे। मन एकदम शांत था…न कोई नोटिफिकेशन, न स्क्रीन की चमक, बस सुकून ही सुकून।
फिर मुझे एहसास हुआ कि मोबाइल ने हमें कई तरह से बाँध रखा है। वो हमारा ध्यान बार-बार भटकाता है, आँखों को थकाता है, नींद ख़राब करता है, परिवार-दोस्तों और अपनों से समय छीन लेता है। हम ‘कनेक्ट’ तो रहते हैं, पर असल में अकेले हो जाते हैं। अब समझ आया कि असली खुशी तो स्क्रीन में नहीं, बल्कि अपनों और अपने अनुभवों में है।
सीख:
• मोबाइल ज़रूरी है, लेकिन उस पर निर्भर रहना गलत है।
• असली मज़ा परिवार, दोस्तों और आसपास की दुनिया में है।
• ज़्यादा मोबाइल देखने से आँखें थकती हैं और ध्यान भटकता है।
• कभी-कभी मोबाइल को भी ‘आराम’ दो, ताकि खुद को फिर से पा सको।
✍️अरशद रसूल,