ये नदियाँ
पहाड़ों के दरकने के असर से
रास्ता बदल रही है नदियाँ,
छोड़कर अपनी राह
जाने कहाँ कहाँ जा रही हैं नदियाँ।
मगर, राह से नहीं, मंज़िल से प्यार है उन्हें,
आज भी समंदर तक पहुँच रही हैं नदियाँ,
पाने के लिए अपनी मंज़िल को
ख़ुद का वजूद मिटा रही है नदियाँ।
पत्थरों से टकराकर भी
अपना संगीत गा रही हैं नदियाँ,
कभी झरनों सी मुस्कुराती हैं,
कभी सागर सी छा रही हैं नदियाँ।
धूप में तपकर, छाँव में बहकर,
हर रंग में ढल रही हैं नदियाँ,
अपने दर्द को छुपाकर भी
सबको जीवन दे रही हैं नदियाँ।
किसी गाँव में प्यास बुझा रही,
कहीं खेतों को हरा बना रही हैं नदियाँ,
अपनी मंजिल पर ही है निगाहें उनकी,
कभी खुशियों का सागर ला रही हैं नदियाँ।
इनमें है त्याग, इनमें है बलिदान,
हर बाधा को पार कर रही हैं नदियाँ,
सिखाती हैं हमें भी चलना निरंतर,
चाहे जितनी कठिन हो सदियाँ ।
कितना कुछ कह जाती हैं ख़ामोश होकर,
बस बहती चली जा रही हैं नदियाँ,
ना ठहराव, ना शिकायत, ना रुकावट,
जीवन का अर्थ समझा रही हैं नदियाँ।