मै तुझ बिन अधूरी और तू मुझ बिन बेरंग.........
क्यों इठला रही हो बदरा,कभी झूम कर, कभी रूठ कर।
देख तेरे अम्बर कि हालत,कभी छाये मे काले बदरा,कभी बेरंग सा लगता है
देख तेरे झूमने से, कितने जीवन मे खुशहाली।
देख तेरी बूंदो से कभी धरा पर है हरियाली कभी झीलो मे हैँ पानी।
देख तेरे रूठने से, कितने जीवन मे बेरंगी ।
देख तेरे रूठने से, कितना सूखा सूखा सा लगता हैँ, कभी झील, नदी हैँ खाली, कभी जीवन ही हैँ खालीं।
क्यों इठलाती हो बदरा, कभी आसमान मे झूमा कर,कभी अपनी जमीं चुम कर जाया कर।
हाँ मे वाकिफ हु तेरे अपनों से, पर क्या तू वाकिफ हैँ मेरे अपनो से।
जब आये कभी तेरे अपने, तो ओला, बिजली ले आते हैँ।
कभी जाये मेरे अपने तो, साख-तने कभी जड़ भी साथ ले जाते हैँ।
तुझे दुख ना होंगा बदरा, तेरे अपने क्या छोड़ जायेगे।
लेकिन मेरा क्या ए बदरा, तुझ बिन भी मै अधूरी हु और जड़ बिन भी अधूरी।
कभी तू मजबूत बनाती हैँ,कभी बिजली तोड़ जाती हैँ।
पर उनका क्या ए बदरा,जो तुझसे निर्मल होते है,फिर मुझसे ही जुड़ जाते हैँ ।
कभी देख ले ए बदरा,मे कब तक तुझे बताऊगी,तू खुद भी तो महसूस कर।
ज़मी ही तेरी अपनी हैँ , जमीं ही तेरी अपनी हैँ।
उतर से दक्षिण को देखो,पूर्व से पश्चिम को देखो।
कभी जम्मू मे हैँ बर्फ जमीं,और अंडमान मे पानी हैँ।
कभी गुहार मोती मे खारा पानी,और किबिथू मे निर्मल लोहित हैं।
तू कहा अकेली पाई बदरा, क्यों इतना ईठलाती हैं , क्यों इतना इठलाती हैं।
हरियाली का श्रृंगार भी तुम्ही और ज़मी कि चुनर भी तुम
तू,,निर्मल जल से पूर्ण रूप हैं, हम हैं तेरे आदि।
आया कर ना हमसे मिलने, तुझसे हैं हम पुरे
आया कर ना बदरा मिलने मत इतना इठालाया कर, मत इतना इठलाया कर
दीपिका सराठे