****सूखे पत्तों की सरगम****
****सूखे पत्तों की सरगम****
सूखे पत्ते कुछ कहते हैं,
हर सरसराहट में कहानी बहते हैं।
कभी हरे थे, जीवन से भरे थे,
अब ज़मीन पर बिखरे, फिर भी खरे हैं।
धूप ने छीना रंग उनका, मगर ताब नहीं,
वक़्त ने छीनी जवानी, मगर ख़्वाब नहीं।
हवा के संग झूमते हैं बेपरवाह,
जैसे रूह में अब भी है कोई चाह।
शाख़ से फ़िराक़ का दर्द गहरा सही,
पर चेहरे पर सब्र का पहरा वही।
कहते हैं — “गिरना मंज़िल का अंत नहीं,
हर पतझड़ में एक नया वसंत कहीं।”
मिट्टी में मिलकर फिर से जनम पाएँगे,
नए पत्तों की सूरत में लौट आएँगे।
सूखे पत्ते यूँ पैग़ाम दे जाते हैं,
फ़ना होकर भी ज़िंदगी सिखा जाते हैं।
स्वरचित,
रजनी उपाध्याय 🙏🌹