शीर्षक :- दिल्ली के "हवाओं में मौत"
शीर्षक :- दिल्ली के “हवाओं में मौत”
रचनाकार:- कवि शाहबाज़ आलम ‘शाज़’
दिल्ली में अब हवा नहीं,
मौत का धुआँ बहता है,
साँस लो ज़रा –
तो लगता है, ज़हर गले से कहता है।
ये वही दिल्ली है जहाँ –
कभी सपने उगते थे,
अब यहाँ हर साँस में
तम्बाकू के दाने सुलगते हैं।
बच्चे स्कूल जा रहे हैं,
किताब के साथ – मास्क लगा रहे है,
मैदानों में अब खेल नहीं,
बस खाँसी की खनक है हर एक कोने पर।
कोरोना से भी बड़ा यह धुआँ,
हर गली में फैलता जा रहा है,
अब तो दिल्ली में साँस लेना मतलब –
दिन में बीस-पच्चीस सिगरेट पी जाना है।
मौत यहाँ मुफ़्त मिल रही है,
बस गहरी साँस लेनी है-
बस वही कीमत देनी है।
सरकार चाहे तो इलाज आसान है,
एक महीने का लॉकडाउन ही ईमान है।
कोरोना में घर में बंद थे तो ज़िन्दा बचे,
अब खुले आसमान में मर रहे हैं –
ये कैसी आज़ादी… ये कैसी सज़ा है!
दिल्ली की आबो-हवा अब जहर उगल रही है,
और हम सब ख़ामोश हैं –
मानो मौत को… इज़्ज़त दे रहे हों।
( शाहबाज़ आलम “शाज़” युवा कवि स्वरचित रचनाकार सिदो-कान्हू क्रांति भूमि बरहेट सनमनी निवासी)