छाँव जुल्फ़ों की
छाँव जुल्फ़ों की
तेरी जुल्फ़ों की घनी छाँव मिले तो क्या बात है,
थकी रूह को थोड़ा आराम मिले तो क्या बात है।
तेरे लबों पर बिखरी हुई हँसी मुस्कान की तरह,
ज़िंदगी को नया इक रंग मिले तो क्या बात है।
तेरी आँखों से छलकती हुई वह नूर की लहर,
गहन अंधकार में उजाला बने तो क्या बात है।
तेरे होंठों की हँसी जैसे सुबह की पहली किरण,
हर ग़म को खुशी में बदल दे तो क्या बात है।
कदमोँ की आहट से महक उठता है संसार सारा
उजडे गुलशन को भी बहार मिले तो क्या बात है।
तेरी बातों में छुपा है प्यार, दिखाई देता है मुझे,
सुनते-सुनते ही इकरार मिले तो क्या बात है।
मायने प्रेम के समझाया है तेरे साथ ने मुझको,
अब ये साथ उम्र भर बना रहे तो क्या बात है।
संजय श्रीवास्तव
बालाघाट मध्यप्रदेश
१२.११.२०२५