दिल मिरा शहर में लगता ही नहीं
दिल मिरा शहर में लगता ही नहीं
कोई अरमाँ यहाँ जगता ही नहीं
राख की गोद में सोया है शरर
अब धुआँ राख से उठता ही नहीं
जोर अजमा के भी देखा हमने
मुश्तक़िल है जो बदलता ही नहीं
मुझको मालूम है तेरा दर भी
उसकी जानिब मैं भटकता ही नहीं
थक गए हैं सभी किरदार यहाँ
और पर्दा है कि गिरता ही नहीं
फैसला कर लिया है मुंसिफ ने
जुर्म का फ़र्क़ तो पड़ता ही नहीं
सूनी सूनी हैं हमारी आँखें
ख्वाब इनमें कोई बसता ही नहीं
रात को नींद सताती होगी
चाँद रूठा है निकलता ही नहीं
तय है पहले से बिछड़ना फिर भी
दिल ये तस्लीम तो करता ही नहीं