Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
12 Nov 2025 · 1 min read

दिल मिरा शहर में लगता ही नहीं

दिल मिरा शहर में लगता ही नहीं
कोई अरमाँ यहाँ जगता ही नहीं

राख की गोद में सोया है शरर
अब धुआँ राख से उठता ही नहीं

जोर अजमा के भी देखा हमने
मुश्तक़िल है जो बदलता ही नहीं

मुझको मालूम है तेरा दर भी
उसकी जानिब मैं भटकता ही नहीं

थक गए हैं सभी किरदार यहाँ
और पर्दा है कि गिरता ही नहीं

फैसला कर लिया है मुंसिफ ने
जुर्म का फ़र्क़ तो पड़ता ही नहीं

सूनी सूनी हैं हमारी आँखें
ख्वाब इनमें कोई बसता ही नहीं

रात को नींद सताती होगी
चाँद रूठा है निकलता ही नहीं

तय है पहले से बिछड़ना फिर भी
दिल ये तस्लीम तो करता ही नहीं

Loading...