विद्यार्थी के लिये किसी विषय को याद करने के स्वर्णिम सूत्र
विद्यार्थी के लिये किसी विषय को याद करने के स्वर्णिम सूत्र
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१.)सिर्फ पढना नहीं अपितु पढे हुये को समझकर लिखना भी आवश्यक है। पहले पढ़ें, फिर उसने अपने शब्दों में अच्छी तरह से लिखें। इससे स्मृति में पढा हुआ देर तक याद रहता है।
२.)जब पढ़ने का मन न हो तो पढना व्यर्थ है। इससे कुछ भी याद नहीं होगा। केवल समय की बर्बादी ही होगी। इसलिये सर्वप्रथम पढ़ने- लिखने के महत्व,उसकी आवश्यकता और प्रासंगिकता को समझें। इससे हो सकता है कि पढ़ने लिखने में मन लगना शुरू हो जाये।
३.) अन्य कयी कारणों के साथ आलस्य भी पढ़ने में मन नहीं लगने का कारण हो सकता है। इसलिये प्रतिदिन या सप्ताह में कुछ दिन व्यायाम, लंबी सैर, दौड़, शारीरिक परिश्रम और योगाभ्यास अवश्य करें। इससे आलस्य से छूटकारा मिलकर पढ़ने में मन लगाने में सहायता मिलेगी।
४.)जिस विषय को पढ़ना चाहते हो,उसका संक्षिप्त नोट्स अवश्य बनायें।शीर्षक और उप-शीर्षकों सहित साफ साफ लिखाई में यह काम करना चाहिये। इससे पठित विषय को दोहराने में कम समय लगेगा।
५.)पढे हुये विषय का यदि रेखाचित्र भी बना लें तो बहुत बढ़िया रहेगा। अवचेतन मन आकृतियों की भाषा को समझता है। विचारों को हुबहू याद रखना संभव हो जाता है।
६.) प्रतिदिन पहले बनाये हुये नोट्स को दोहराने का प्रयास करें। यदि कम समय हो तो प्रतिदिन नोट्स के रेखाचित्र पर नजर डाली जा सकती है। इससे भी पढा हुआ याद रहेगा।
७.)जो भी लिखो, उसे ऐसे लिखो जैसे आप खुद को ही समझा रहे हो। इससे पढा हुआ अवचेतन मन तक संग्रहित रहेगा।
८.) चालीस मिनट तक पढ़ने के पश्चात् आंखों को बंद करके दस पंद्रह मिनट तक विश्राम कर लो।या फिर कोई संगीत वगैरह सुना जा सकता है।या अपनी रुचि अनुसार पैंटिंग आदि बनाने में शांत महसूस करें।इस दौरान वह काम करें जिसे खेल की तरह कर सकते हों।
९.) रट्टा मारकर पढना पढाई का सबसे निकृष्ट ढंग है।भारत में पिछले पिचहतर वर्षों से यही ढंग प्रचलित है।ऐसा न करें। आवश्यक है कि समझकर पढ़ने का प्रयास करें। पढ़ने के ढंग में प्रायोगिक होना आवश्यक है। अपनी पढ़ाई को नित्यप्रति के जीवन से जोड़कर करें।
१०.) पढ़ने के लिये बार बार विषय को मत बदलें अपितु एक ही विषय पर पूरी एकाग्रता से पढ़ें। प्राचीन काल से ही भारत में पढ़ने और लंबे समय तक उसे याद करने के लिये अवधान विद्या प्रचलित रही है। इसकी सहायता से आप बड़े बड़े विषयों को पढ़कर सरलता से याद कर कर सकते हैं। सूत्र रुप शास्त्रों को याद करने के लिये इसी विद्या का प्रयोग होता आया है।
११.)जो भी पढकर आपने लिखा है या उसका रेखाचित्र बनाया हुआ है,उसे अच्छी तरह से संभालकर रखे।विश्वविद्यालयीन और प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी में अंतर होता है।
१२.)जब अच्छी तरह से याद करने का अभ्यास हो जाये तो वर्णनात्मक की जगह पर आलोचनात्मक, समीक्षात्मक लिखना और सोचना प्रारंभ करें। दर्शनशास्त्र विषय इसमें सभी संकायों के विषयों की तैयारी में सहायक हो सकता है।
१३.) पढ़ने, लिखने,याद करने और उसकी अभिव्यक्ति में किसी का भी अंधानुकरण मत करें,चाहे वह आपका वरिष्ठ विद्यार्थी हो या फिर शिक्षक ही क्यों न हो।
१४.)नींद पूरी लें। अधकचरी नींद आलस्य का कारण बनती है।शाम को जल्दी सो जायें और सुबह जल्दी उठ जायें। आजकल पाश्चात्य परिवेश के प्रभाववश विद्यार्थी,विशेषकर प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थी रात के दो -दो ,तीन -तीन बजे तक पढ़ते हैं और फिर सुबह नौ दस बजे उठते हैं।देह की भी एक जैविक घड़ी होती है,उसको आगे- पीछे करने से शरीर बिमारियों से ग्रस्त होकर मानसिक अवस्था भी बिमार हो जाती है। शिक्षा के साथ शिक्षार्थी की शारीरिक आरोग्यता भी आवश्यक है।
१५.) भोजन हल्का और सात्विक ग्रहण करें। भोजन से पहले सलाद, सब्जियां और फलों को अपने भार के अनुकूल अवश्य ग्रहण करें। इससे आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति होती रहेगी।अधिक चाय, काफी, कुल्फी आदि का सेवन हानिकारक है। विद्यार्थी की स्मृति शक्ति को निरोग करने के लिये यह अति आवश्यक है। भोजन से ही देह,मन और स्मृति का निर्माण होता है। तामसिक भोजन मांसाहार और नशा करने से शरीर की अवस्था आलस्य की हो जाती है।
१६.) भोजन करते ही पढना शुरू मत करें। इसके लिये कुछ समय की प्रतीक्षा अवश्य करें। भोजन करने के पश्चात् भोजन के पाचन के लिये शरीर की ऊर्जा पेट की तरफ चली जाती है।
१७.) यदि मानसिक अवस्था तनाव, हताशा, कुंठा आदि से ग्रस्त हो तो ऐसा विद्यार्थी को नियमित रूप से सुबह- शाम संध्याकाल में कपालभाति, अनुलोम विलोम, नाडी शुद्धि, भ्रामरी प्राणायाम के कुंभक सहित तीन- तीन चक्र तथा ओंकार और प्राणापान धारणा का अभ्यास 10-10 मिनट के लिये करना चाहिये।
१८.) विद्यार्थी को,विशेष रूप से प्रतियोगिता परीक्षाओं के विद्यार्थियों को अपने मित्र आदि के साथ अधिक समय तक व्यर्थ की बातचीत में समय नष्ट नहीं करना चाहिये।आयु का यह अधिकांश समय शिक्षा के लिये समर्पित कर देना चाहिये।
१९.) विद्यार्थी के लिये एकांतवास करके पढना सर्वाधिक आवश्यक है। इससे ऊर्जा की बचत होती है,जो पढ़ने में काम आती है। सुविधानुसार घर में या बाहर या हास्टल आदि में स्थान का चुनाव कर लेना चाहिये।
२०.) अधिकांश समय तक मौन रहकर पढना विषय को स्मरण करके धारण करने में सहयोगी बनता है। व्यर्थ में अधिक बोलने से भी ऊर्जा नष्ट होती है।
२१.) और अंत में एक शिक्षापरक श्लोक का अवलोकन कर लिजिये –
काक चेष्टा बको ध्यानं श्वान निद्रा तथैव च।
अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पंच लक्षणम्।।
अर्थात् विद्यार्थी को कौवे जैसी चेष्टा, बगुले जैसे ध्यान, कुत्ते जैसी नींद ,कम भोजन करने वाला तथा एकांतवासी होना चाहिये।
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आचार्य शीलक राम
वैदिक योगशाला