#दिल्ली_त्रासदी #कार_ब्लास्ट
अचानक शाम भई वह कैसी,
लाल किले पर हाहाकार।
धमाके की अति तीव्र दहाड़न,
काँप उठी सारी दीवार।
सफ़ेद सवारी आग उगल गई,
टूटे शीशें उड़ें गुबार।
लहू लथपथ तन लाशें बिखरीं,
दिल्ली रोई बिछा अँगार॥
सहसा एक प्रचंड तड़ाका,
शांति नगर की टूटी धार।
हवा में उड़ गए कागज़ जैसे,
टूटे मन के सारे तार।
विदेशी दूतों की थी टोली,
लक्ष्य बना आतंक प्रहार।
जहाँ बसंत की आहट आई,
छा गया वहाँ भीषण अँधियार॥
देश की राजधानी रोती,
देख ये क्रूर अमावस रात।
शोक की अग्नि दहकन लागी,
देख विकराल भयानक घात।
वीर जवान लड़े हैं जिसने,
देश पे वार किये सौ लात।
चैन से नींद नहीं अब पावै,
हो गई शत्रु की ये सौगात॥
सुरक्षा-तंत्र पे प्रश्न उठे हैं,
कौन करे इतनी बड़ी भूल?
अराजक तत्व कहाँ से आए,
क्यों हुई राजधानी अनुकूल?
कसूरी कौन है इसकी भाई,
कौन रहा इस पाप का मूल?
जाँच करै अब सारी दुनिया,
कैसे बिछला दिल्ली का फूल॥
जलती कार उगलती ज्वाला,
दूर तलक सब धुँआ ही धुँआ।
चीख पुकार मची हर दिश में,
देख हुई दुनिया अब गुमाँ।
हाथ में ख़ून लगा है किसके,
कौन किया इतना बड़ा गुनाह।
शांत नहीं होगा यह भारत,
देगा शत्रु को गहरी जगह॥
सँभल के रहना होगा हमको,
आँख खुली हर दम अब राखो।
आतंकवाद की जड़ को काटो,
भेद के इनकी चालें ताको।
न होगा वार सफल अब कोई,
देश की रक्षा सब मिल साखो।
अमन-शांति फिर होगी जग में,
शक्ति से इनकी कमर अब भाँखो॥
@स्वरचित व मौलिक
कवयित्री: शालिनी राय ‘डिम्पल’
आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश।