#प्रसंगवश
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■ आज की बात : कहानी के साथ:-
【प्रणय प्रभात】
कभी एक छोटी सी कहानी थोड़ी सी देर में वो सब कह देती है, जिसे हम पूरे दिन में नहीं समझा सकते।आज की यह छोटी सी कहानी भी कुछ ऐसी ही है। यह उन तथाकथित आदर्शवादियों और नकली भामाशाहों के लिए है, जो अपनी धनाड्यता और संस्कारों की बातें तो ताल ठोक-ठोक कर करते हैं, मगर बात मानवता की मदद की आ जाए या सवाल बच्चों के चेहरों पर एक अदद मुस्कान लाने का हो तो सोच में पड़ जाते हैं।
यह किसी को उलाहना देने का प्रयास नहीं, केवल अपने उद्वेग को शांत करने की छोटी सी कोशिश है। गौर फ़रमाइएगा)
“एक नगरी में एक धनी सेठ था। पूर्वजों की परम्पराओं को निर्वाह करने की आदत अपने पिता के अनुसरण से पड़ गई थी, लिहाजा जनसेवा के नाम पर कुछ न कुछ किया करता था। गर्मी का मौसम आया तो सेठ ने अपनी दुकान के बाहर हर साल की तरह पानी के कुछ मटके रखवा दिए और राहगीरों को पानी पिलाने के लिए एक कर्मचारी भी तैनात कर दिया। एक दिन भीषण गर्मी के बीच प्यास से बेहाल एक राहगीर दुकान पर आया और सेठ से पानी पिलाने का आग्रह किया।
सेठ ने कहा कि पानी पिलाने वाला आदमी अभी कहीं गया है और आने वाला है. लिहाजा वो थोड़ा सा इंतजार करे। प्यास से बेहाल पथिक ने कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद खुद को और बेहाल पाया तथा से से पुनः पानी पिलाने का निवेदन किया। सेठ ने फिर वही दोहराया कि आदमी बस आने ही वाला होगा। वो दो-पांच मिनट और सब्र करे। प्यासे राहगीर की बैचेनी बढ़ती जा रही थी। उसके मुंह और हलक के साथ-साथ आत्मा तक बेहाल थी।
जब उससे नहीं रहा गया तो उसने फिर से पानी पिलाने के लिए याचना की। सेठ बार-बार एक ही बात को सुन कर पहले से गर्मी में था. जो इस बार और भी तैश में आ गए। उन्होने कहा कि जब एक बार कह दिया कि अभी आदमी नहीं है तो नहीं है। थोड़ी देर में आने वाला है तो वो पानी पिलाने की बात बार-बार कह कर उन्हें परेशान क्यों कर रहा है। सेठ का रौद्र रूप देखते हुए राहगीर पहले तो कुछ सहमा लेकिन उसके बाद उसने हिम्मत जुटा कर यह एक वाक्य कह ही दिया किः-
“सेठ जी! थोड़ी देर के लिए आप ही आदमी बन जाइए ना।” :
तात्पर्य सिर्फ इतना सा है कि हम सेवाभावी और समर्पित वृत्ति रखते हुए भी यदि दूसरे पर निर्भर बने रहें तो हमें अपनी आदमीयत के बारे में सोचने की जरूरत किसी न किसी हद तक जरूर है।
बहरहाल, बहुत-बहुत आभार और साधुवाद उन गिनी-चुनी शख्सियतों के लिए, जिन्होने इस बार गरीब परिवारों के बच्चों के साथ दीपावली मनाने के एक संकल्प को अपना सम्बल बिना किसी सोच-विचार के स्वप्रेरित भावना के साथ दिया। संदेश भेज कर कार्यक्रम के बारे में जानने और मदद का हाथ बढ़ाने वाले सभी शुभचिंतक व सदाशयी मित्रों के प्रति अंतर्मन से आभार।
विशेष आभार उन बालिकाओं व बालकों की ओर से जिन्होने इस बार की दीपावली पर इस महायज्ञ को करने का संकल्प लिया और यह आश्वस्त कराने का प्रयास चाहे-अनचाहे किया कि नई पीढ़ी आधुनिक व आत्म-केंद्रित ही नहीं सेवाभावी, परोपकारी व संवेदनशील भी है।
अब इसी क्रम में एक निवेदन नई प्रतिभाओं को मंच देने के उद्देश्य से जुड़ा हुआ है। एक संस्थान, जो सृजन को पहले प्रेरित व प्रोत्साहित करे। फिर तलाशी और तराशी गई प्रतिभाओं को स्थापित व सम्मानित करे। इस संगठन की आधार शिला दीपावली के बाद एक आयोजन के रूप में रखी जा चुकी है। अब अगले चरण में एक मजबूत नींव रखने के साथ पहले तल का निर्माण संकल्प में है। एक नए और अभिनव आयोजन के रूप में।
स्मरण रहे कि जब हम किसी के सम्मान के लिए आगे बढ़ते हैं, तो स्वयं भी प्रतिष्ठित होते हैं। यह एक अवसर होगा अपने दिवंगत परिजनों व प्रियजनों की स्मृतियों को अक्षुण्ण बनाने का। यथोचित अंशदान व समयदान के रूप में। समर्पित व साहित्यनिष्ठ मित्रों का सहयोग सदैव सा अपेक्षित रहेगा। स्वस्फूर्त पहल करने वाले वंदनीय, अभिनंदनीय होंगे। जय राम जी की।
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संपादक
न्यूज़&व्यूज
श्योपुर (मध्यप्रदेश)