*चलो हम भी अब थोड़ा गुनगुनाते हैं*
चलो हम भी अब थोड़ा गुनगुनाते हैं
चलो हम भी अब थोड़ा गुनगुनाते हैं
गम भूल कर थोड़ा मुस्कराते हैं।
दुनिया में संघर्ष तो हर कोई है करता
इन संघर्षों से हम भी आँखें मिलाते हैं।
चलो हम भी अब थोड़ा गुनगुनाते हैं ….
सच -झूठ बोलकर सब जगह बनाते हैं
जैसे भी हो पाये बड़ा बन दिखाते हैं ।
बड़ा बनकर लेकिन वो मानव नहीं रहते
बात -बात पर सबको आँखें दिखाते हैं
चलो हम भी अब थोड़ा गुनगुनाते हैं. …
जब तक हमने सबकी जी हजूरी की
तब तक ही हमको वो अच्छा बताते हैं
जरा सा उनको आईना जो दिखाया
हमको वो जमाने सबसे बुरा बताते हैं
चलो अब हम भी अब थोड़ा गुनगुनाते हैं. .
सबको खुश रखने की कोशिश थी हमारी
लेकिन हर बार थोड़ा चूक जाते हैं ।
घर वालों को खुश करते हैं जब भी हम
अक्सर तब बाहर वाले रूठ जाते हैं ।
चलो हम भी अब थोड़ा गुनगुनाते हैं. .
मौलिक सृजन
पूनम दीक्षित
कृष्णा विहार कॉलोनी
ज्वाला नगर रामपुर
उत्तर प्रदेश