मेरे पापा
जब कोई मां और पिताजी के बारे में लिखने के लिए कहे तब ऐसा लगता है जैसे किसी ने समंदर को एक मटके में भरने की बात कह दी हो तब मैं लिखती हु
#मेरे_पापा
कौन भला भर पाया है सागर एक घड़े में
कौन भला भर पाया है संपूर्ण संसार दो नयनों में
कैसे लिखूं एक पृष्ठ पर उनको,जिनके लिए पूरी किताब कम है
कैसे लिखूं परिश्रम उनका,जिनके तन पर चमकते हैं परिश्रम के मोती
दिन का हर पल जिनका चिंता में बीतता है
घर की रोजी रोटी में दिन का हर पल कटता है
वो टूटकर बिखर जाते है भीतर अंतर्मन से
पर नहीं सिकन की कोई रेखा दिखती है उनके माथे पर
उनके हिस्से नहीं है रविवार ना कोई तीज त्यौहार
क्योंकि वो है एक किसान, क्योंकि वो है एक किसान
सुबह उनकी हरियाली के संग होती है
बाते हीरा मोती के संग होती है
तीज त्यौहारों का क्या ही कहना उनका
मन में हीरा मोती की भूख प्यास जो बसती है
तो कैसे लिखूं उनके लिए रविवार
कैसे लिखूं उनके हिस्से का कोई काम
काम पूर्ण होते है सब उनसे ही
खुशियां है घर में उनसे ही
वो नींव है घर की
जो संजो के रखती है दीवारें घर की
मेरे पापा को जो लिखना चाहूं शब्द कम पड़ जाते हैं
सागर की गहराई सा है प्रेम परिश्रम संपर्पण उनका
ढलती उम्र संग चलते है,कभी कभी गुस्सा भी करते है
उम्मीद की एक डोर वो अपनी बेटी से भी बांधे रखते है
देख कर उनको जी लेती ह
खुश रहे वो कोशिश करती हु
सुना है ढलती उम्र में होता है बचपना ,
पर मुझको अपने पिताजी में दिखता है अभी भी बड़प्पन का घराना
हा वो पिताजी है मेरे जिसके लिए मेरी हथेली पर है सहनशक्ति की गहरी ये रेखा,और हृदय में मेरे हौसले का घराना
निरंजना डांगे
बैतूल मध्यप्रदेश