वो ओर मै
वो रातों का तारा
मैं घना अंधेरा,
वो पूरी सी ख्वाइश
मैं टूटता सा तारा ।
वो जलता सा दिया
मैं दिए का बाती,
वो रातों की सपने
जो सोने ना देती ।
वो सुबह का चाय
मैं मौसम हूं सर्दी,
वो निखरता सा हीरा
मैं पीतल भी फर्जी ।
वो बहती सी नदी
मैं नदियों का पानी,
मैं कटी सी पतंग
वो हवा नादानी ।
वो रातों का नींद
मैं नींदों मैं सपना
सपनो मैं वो और उनमें है हम और हम मैं वो ।