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11 Nov 2025 · 1 min read

वो ओर मै

वो रातों का तारा
मैं घना अंधेरा,
वो पूरी सी ख्वाइश
मैं टूटता सा तारा ।

वो जलता सा दिया
मैं दिए का बाती,
वो रातों की सपने
जो सोने ना देती ।

वो सुबह का चाय
मैं मौसम हूं सर्दी,
वो निखरता सा हीरा
मैं पीतल भी फर्जी ।

वो बहती सी नदी
मैं नदियों का पानी,
मैं कटी सी पतंग
वो हवा नादानी ।

वो रातों का नींद
मैं नींदों मैं सपना
सपनो मैं वो और उनमें है हम और हम मैं वो ।

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