काम न आए दाम रे
प्रदीप छंद
काम न आए दाम
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काम न आए दाम अंत में, भज ले सीता राम रे।
नहीं ठिकाना इस जीवन का, कब हो जाए शाम रे।।
तेल-फुलेल क्रीम कंघी से, भले सजा ले चाम रे।
नहीं कमाया सुयश अगर तो,मिट जाएगा नाम रे।।
परहित से बढ़ धर्म नहीं है, चर्चा खासो-आम रे।
सेवा धर्म निभाते जो नर, प्रभु लेते हैं थाम रे।।
बौरा देता धन की लालच, कर देता बदनाम रे।
शांति छीन लेता है मन का, नहीं मिले आराम रे।।
पाप कर्म से अर्जित धन का, बुरा बहुत अंजाम रे।
तनाव ग्रस्त हो छटपटाता, मन फिर आठोयाम रे।।
__ अशोक झा ‘दुलार’
मधुबनी (बिहार)