प्रेम की प्रतिमूर्ति
प्रस्तावना
यह नाटक तीन आत्माओं का संगम है जो एक हो जीवन यज्ञ शाला में प्रज्ज्वलित वह ज्योति शिखर है।
जो प्रेम देह से ऊपर उठकर आत्मा की पराकाष्ठा को छू लेती हैं। तब वह प्रेम की प्रतिमूर्ति हो जाती है।
पात्र सूची :
1. पति – एक संवेदनशील, आत्मसंघर्षरत व्यक्ति।
2. पत्नी (भार्या) – स्नेहमयी, आत्मीय परंतु भीतर प्रश्नों का ज्वालामुखी।
3. प्रेमिका (स्वर / स्मृति के रूप में) – कोमल, त्यागमयी, अब परलोकवासी आत्मा।
4. वाचक – मंच निर्देश और भाव संक्रमण को जोड़ने वाला स्वर।
दृश्य 1 : (मंच मंद प्रकाश में)
हल्का प्रकाश।
मंच के बीच मेज पर दीपक जल रहा है। पति सोच में कुर्सी पर झुका हुआ
मेज पर अपनी डायरी पर लिखते हुए कुछ काव्य पंक्ति गुन गुनाने हुए विचारमग्न बैठा है।
धीरे-धीरे पत्नी प्रवेश करती है।
वाचक (गंभीर स्वर में):
रात्रि की निस्तब्धता में,
जब विचारों का शोर भी थम जाए,
तब एक प्रश्न उठता है —
प्रेम का, सत्य का, और आत्मशोधन का…
भावनाओं का प्रवाह…जो मूकता से अधर पर आ जाता है।
वहीं से आरंभ होता है यह संवाद।
पत्नी (धीरे, कोमल किंतु दृढ़ स्वर में): (पति की ओर देखकर)
कहिए… एक बात पूछूँ? किससे तुम्हारा प्रेम प्रमोदन है?
कौन है वह, जिसने तुम्हारे जीवन की जटिल कहानी को इतना शांत कर दिया है?
(थोड़ा ठहराव, फिर)
लगता है, अब तुम्हारे मन में कोई और बसता है…
सच बताओ, कौन है वह, क्या वह तुम्हे मुझसे ज्यादा चाहती है, क्या मैं तुम्हें प्रेम नहीं करती?
पति (धीरे से, गहरी साँस लेकर):
क्या बतलाऊँ भावों की कहानी जो इस हृदय में है, क्या तुम मेरी भावना समझ सकोगी?
बोलो सुनना चाहती हो तो सुनो..।
(थोड़ी दे शांत हो)
यह जो परिवर्तन तुम देख रही हो,
यह किसी धर्म का नहीं —
मेरे सच्चे प्रेम लग्न की पाती है।
उसके द्वारा दिया संयोजन ही मेरे जीवन की थाती है।
(रुकता है, आँखें झुका लेता है)
वाचक:
शब्दों के पीछे छिपा सत्य
अब धीरे-धीरे उजागर हो रहा था।
पत्नी की आँखों में प्रश्न थे
तो पति की नज़रों में आत्म समर्पण।
पत्नी (कंपित स्वर में):
तो… सचमुच कोई है?
कौन है वह स्त्री, जिसके प्रेम ने तुम्हें यह नया स्वरूप दिया है?
क्या वह मुझसे भी अधिक तुमसे प्रेम करती है, क्या उसके सामने तुम्हारे लिए मैं कुछ भी नहीं।
पति (धीरे, भावुक होकर):
कह नहीं सकता, लेकिन वह… वह कहती थी —
“तुम बहुत भाग्यशाली हो, तुम एक अनमोल रतन यानी मुझे पाओगी।”
वह तुम्हारे लिए यही शब्द कहती थी…
उसके मन में तुम्हारे प्रति कोई ईर्ष्या नहीं, बल्कि केवल श्रद्धा थी।
(थोड़ी देर रुक कर पत्नी से नजरें मिलते हुए शांत और सहज भाव में कहता है)
उसके हृदय में बस टीस थी कि मैं उसे मिल ना सका,
फिर भी वह यहीं कहती थी कि जब तुम विवाह करना,
तो अपनी पत्नी से उतना ही प्रेम करना जितना मुझसे करते हो।
पत्नी (अचरज और वेदना में):
वह… मुझे जानती थी? मुझे ‘भाग्यशाली’ कहती थी?
वह कौन? है जो आपको इतना संवर्धित कर दिया।
उसकी भावना तो बड़ा पवित्र जान पड़ती है।
पति (स्मृतियों में खोकर):
नहीं वह तुम्हें नहीं जानती थी…
लेकिन उसने कहा था —
“जब अपनी भार्या से मिलो, तो उससे मेरी बातें कहना,
वह तुम्हारा जतन करती रहे, जैसे अब तक मैं करती आई हूँ…”
(धीरे स्वर में, हल्की कंपकंपी के साथ)
कितनी शांति थी उसके शब्दों में…
कितना त्याग था उसके प्रेम में…
वह साक्षात् प्रेम की प्रतिमूर्ति थी…
वाचक:
प्रेम, जो अधिकार नहीं माँगता,
बल्कि दूसरे के स्नेह का वर माँगता है —
अपने जीवन का त्याग कर,
समिधा यज्ञ की प्रज्ज्वलित अग्नि बन जाता है।
वह प्रेम आत्मा को मोक्ष के समीप ले जाता है।
पत्नी (कंपित स्वर में, आँसुओं से भरी आँखों से):
तो…तुमने कभी मुझे उससे मिलवाया क्यों नहीं?
मैं उससे कहना चाहती हूँ कि उसका प्रेम तुम्हें कितना ऊँचा बना गया है…।
तुम्हारे अंदर उसकी आत्मा का हर एक शब्द वंदना,
संस्कृत शब्दावली का श्लोक बन गया है।
पति (गंभीर, धीमे स्वर में):
(गहरी साँस लेते हुए)
तुमसे उसको मिला न सका… ना उसे ही तुमसे
शायद वह ईश्वर के भावार्थ बोध में छली गई…
दुःख है इतना कहा न जाता… जैसे कण्ठ अवरुद्ध हो गए हो।
हा…अब वह इस संसार में नहीं है —
मोक्षधाम को चली गई…।
(आवाज़ भर्रा जाती है, मौन छा जाता है।)
वाचक (मंद स्वर में):
दीपक की लौ हिल रही है —
मानो समय ठहर गया हो।
दो जीवन… एक स्मृति… और एक अनुपस्थित आत्मा,
तीनों एक ही भाव में विलीन हो गए।
पत्नी (धीरे, नम्र स्वर में):
(पति के पास जाकर उसके माथे को सहलाते हुए)
वह चली गई…पर उनका प्रेम तो यहाँ है —
तुम्हारे भीतर, और अब… मेरे भीतर भी, वह एक पवित्र आत्मा थी,
वह बहुत भाग्यशाली थी कि आपकी वह राधा बनी।
मैं रुक्मिणी ही रह गई, काश मैं आपकी राधा बन पाती…।
पति (धीरे, आँखें बंद कर):
हाँ…वह चली गई, पर मुझे अपने प्रेम का ऋणी बना कर गई —
वह शुद्ध, निर्मल गंगा जल सा पवित्र, आत्मिक…शोध की शक्ति थी,
उसका शब्द मुझे मेरे कर्त्तव्य पथ से जोड़े रहा।
आज हम दोनों एक परिणय सूत्र से जुड़े हुए है..।
और वह स्वयं अनंत में विलीन हो गई।
वाचक (संवेदनात्मक समापन):
प्रेम कभी समाप्त नहीं होता —
वह बस रूप बदलता है।
कभी प्रश्न बनकर आता है,
कभी उत्तर बनकर मोक्ष हो जाता है।
(धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में कविता की पँक्तियाँ गूँजती हैं —)
“दुःख है इतना कहा न जाता,
मोक्षधाम को चली गई…”