"सच मन से कब बड़ा है"
“सच मन से कब बड़ा है”
जिंदगी के फैसले भी, फासले बनते गए,
हर मोड़ पर अपने ही, पराये से लगते गए।
हम जी रहे थे जिनके लिए, वो ही हमारे न रहे,
भीड़ में चेहरे तो रहे, पर दिल के सहारे न रहे।
कोई कह दे झूठ सब, मन यह आज भी कहता रहा,
कि लौट आएंगे वो, ये भ्रम भी सच्चा लगता रहा।
पर सच तो सच है, सच मन से कब बड़ा है,
जो बीत गया वो वक्त, अब यादों का धरा है।
हवा में बिखरी खुशबू, अब खाली सी लगती है,
उनकी हँसी की गूंज भी, जैसे कोई दूरी कहती है।
दिल चाहता है फिर वही, पुराना अपनापन,
पर ज़िन्दगी अब सीख गई — “हर दर्द ही एक पाठ है मन।”
फासलों में भी अब, रिश्ता कोई बाकी है,
यादों के साये में छिपी, वो आंखों की नमी बाकी है।
कभी जो थे हमारे, वो आज भी एहसास में हैं,
सच को स्वीकार कर लिया — अब हम भी विश्वास में हैं।
मुकेश शर्मा विदिशा