संतुष्टि के पैमाने
संतुष्टि के पैमाने
सड़क किनारे देखा मैंने, जीवन के अफसाने,
जहां न ठहरते हम क्षण भर, थे सुख के ठिकाने।
नंगी ज़मीन, आसमान छत, फिर भी मुस्कान सजाई,
फटेहाल कपड़ों में बच्चों ने, खुशियों की माला पिराई।
दाल-भात की थाली छोटी, पर मन था विशाल,
एक-दूजे संग बांट रहे थे, प्रेम का अमृत काल।
ना शिकवा, ना कोई चाहत, ना दिल में अभिमान,
फिर भी हर चेहरे पर था, संतोष का वरदान।
कितने धनवान लगते थे वो, मन के मखमल ताने,
आसमान की छत के नीचे, संतुष्टि के बड़े-बड़े पैमाने ।