समय का संवाद
बीते लम्हें करती हैं बातें, मांगती हैं हिसाब हर क्षण का।
लक्ष्य भूल जो बैठा, सिर पर हाथ धरे — उससे कहती हैं, “बता, तुझे ग़म है किस बात का?”
तू चलता जा, रुकने का छल न कर ;
गर हुई त्रुटि — सुधार कर, किंतु बढ़ता चल।
मैं साक्षी हूँ तेरे हर अंतर्विरोध का;
आवश्यकता नहीं तुझे और किसी प्रमाण का।
लोग फँस जाते हैं मुझमें —
जैसे हूँ मैं कोई अभिमन्यु के चक्रव्यूह-सा,
और जैसे तृष्णा के कारण मुसाफ़िर को –
हर पल रेगिस्तान में दिखे मृगमरीचिका।
संभल!
मैं नहीं हूँ दवा तेरे किसी दर्द का,
लेकिन दूआ हूँ किसी की, तेरे अच्छे पलों का ।
जिसने मुझे खर्चने का बना रखा हो ब्यौरा,
जिसके वही खाते में दर्ज हो हिसाब हर बीते पल का,
वह देखता है जागती आँखों से अपने लिए ख़्वाब,
और हर पल में ढूँढ़ लेता है सुख अपने हिस्से का।
ज़िंदगी के ग़म उसे क्या देंगे शिकस्त —
जब काँटों पर चलना ही शौक़ हो उसका !
बहाने बनाना जिनकी फ़ितरत ही नहीं —
दुनिया में कोई प्रतिद्वंदी हो भी कैसे उसका?
जो न करता मुझे ज़रा भी व्यर्थ —
उसके अंदर विकसित होता है ऐसा सामर्थ्य,
वह समझने लगता है जीवन का गूढ़ तत्व
तब अविस्मरणीय बन जाता है उसका व्यक्तित्व।
यदि न कर पाए तुम मेरा सदुपयोग,
और न रख सके मुझ पर नियंत्रण —
तो तुम दे रहे हो जानबूझकर,
अपने लिए विपत्ति को निमंत्रण।
कोई कहे मुझे ‘समय’, तो कोई ‘काल’ कहता है;
मुझमें ही कैद सबका इतिहास रहता है।
समझकर भी यदि तुमने न समझी मेरी ताकत —
पल भर में मिट्टी में मिल जाएगी
तुम्हारी शख़्सियत!